रविवार, 7 जून 2015

गाँव से हिटौडा, नेपाल यात्रा : पहला दिन

ऐसा पहली बार हुआ था कि मैं और पत्नी आठ महीने दूर रहे थे इसलिये मिलते ही मलिकाइन (पत्नी) की पहली डिमांड यही थी कि कहीं घूमने चलते हैं। मैंने कहा होली में गाँव चल ही रहे हैं, लगे हाथों नेपाल भी घूम लेते हैं। मलिकाइन की ओर से हरी झंडी मिलते ही हफ्ते भर का प्रोग्राम बना लिया। गाँव की ही एक बोलेरो बुक कर ली गई। आज कल गाँवों में बोलेरो बहुत हो गईं हैं। ड्राइवर मिले उमा शंकर। शुक्रवार की सुबह पाँच बजे निकलने का प्लान बना, लेकिन जहाँ औरत हो वहाँ कोई समय से कैसे निकल सकता है। निकलते निकलते आठ बज गया। गाँव से पूरब दिशा में निकले और आगे बढे। प्लानिंग थी कि गोपालगंज, रामपुर खजुरी , सुगौली होते हुए रक्सौल -बीरगंज के रास्ते नेपाल में प्रवेश किया जाय और उसी दिन काठमांडू पहुँच जाया जाय। लेकिन प्लानिंग करने से क्या होता है! होता तो उस प्लानर के हिसाब से है जो उपर बैठा हुआ है। खैर बलुआ अफगान घाट पार कर के मुसहरी होते हुवे भोरे पहुँचे। भोरे चरमोहानी पार करने के बाद आई लखराँव की बारी (बगीचा)। किसी जमाने में यहाँ विशाल बागीचा हुआ भी करता था। जनाब सैकड़ो पेड तो यहाँ मेरे बचपन तक मौजूद थे। आम, कटहल, महुवा, शीशम हर तरह के स्थानिय पेड। हलकि आम के पेड ज्यादा थे। अब तो बमुश्किल पच्चीस तीस पेड बचे हैं और वो भी इस वजह से कि किसी पर भूत है जो पेड नही कटने देता तो कोई विवादित है जिसके मालिकाना हक को ले कर गोलीबारी तक हो चुकी है। हाँ बन्दर अभी भी काफी मौजूद हैं। ये बिचारे जाएं तो जाएं कहाँ! आगे बडका गाँव से दाहिने मुड़ लिये ताकि मीरगंज का चक्कर लगाने के बजाय लाइन बजार से सीधा थावे पहुँच जाएं। लेकिन लाइन बजार में रास्ता गड़बड़ हो गया और हम थावे के बजाय कुचाँयकोट की तरफ निकल गए। काफी देर बाद गलती पता चली। फिर जैसे तैसे रास्ता पूछते गाँवों के बीच से किसी तरह हाइवे पर पहुँचे। गोपालगंज पहुँचते पहुँचते ग्यारह बज गए। हम चलते रहे और थोडी देर बाद रामपुर खजुरी में गंडक पुल पार कर गए। जोरों की भूख लग आई थी। चलते समय हमारे माननीय (पिताश्री) ने मछली पैक कर दिया था। एक जगह गंडक तीरे डब्बा खोला और मछली रोटी की दावत उडाई। बेटी तो नदी देख कर ही खुश हो गई। वहाँ से खा पी के आगे बढे तो शुरू हुआ खराब रास्ता। अरेराज से सुगौली तक का रास्ता तो फिर भी ठीक था लेकिन सुगौली से रक्सौल के रास्ते ने लोहे के चने चबवा दिये। और वो भी नाक से। तकरीबन साढे तीन बजे नेपाल में प्रविष्टहुए। भंसार (नेपाल कस्टम) पर रुकते ही दलालों का हमला हुआ। एक से छ: सौ कमीशन पर ममला पटा। उसने सारे कागज तैयार करा दिये। एक कागज वहाँ से पाँच कीलोमीटर की दूरी पर बनता था। वहाँ तक हमारे साथ आकर उसने कागज बनवाया। इतना सब होते होते छ: बज गए। अब तो आज काडमांडू पहुँचने कोई उम्मीद नहीं बची थी। फैसला हुआ जब तक संभव हो चलते है। रास्ते यें कही रूक लेंगे। थोडी देर बाद अंधेरा हो गया, पहाडी रास्ता शुरू होने पर मलिकाइन ने यह कहते हुए आगे बढने से ईंकार कर दिया कि निकले हैं पहाड देखने और वहीं नहीं दिख रहा। फिर हितौडा में होटल लिये और रात्रि विश्राम ले लिये।
                                          
निकल पड़े............


गण्डक तीरे

वो देखो.......

नदी नाव संयोग

प्रवेश द्वार नेपाल

नेपाल कस्टम
नेपाल यात्रा संस्मरणे, प्रथम दिवसस्य व्रितांत: सम्पूर्ण:! इति