बुधवार, 17 दिसंबर 2014

चिडिया घर

अगले दिन हम चिडिया घर जाने की योजना बनाए। हमने टैक्सी ली और चिडिया घर के लिए निकल पडे।  चिडियाघर अलीपुर मेँ है। सुबह 10 बजे तक हमलोग अलीपुर चिडिया घर पहुंच गए। वहाँ जाकर देखा कि पुराना दरवाजा बंद कर दिया गया है और नया दरवाजा दरवाजा खोल दिया गया है। दस वर्षों में टिकट का दाम 10 रुपए से बढ़कर 20 रुपये हो गया है।चिडिया घर के बाहर ही बड़े से बोर्ड पर चेतावनी लिखी हुई थी कि जानवरों को कुछ खिलाना मना है और उस बोर्ड के नीचे ही छोटे छोटे फेरीवाले जानवरों को खिलाने के लिए चने बेच रहे थे। चिडिया घर काफी लंबा चौड़ा है। हमारी बेटी चल नहीँ सकती थी इसलिए हमने उसे कैरी बैग में लटका लिया था। हमने टिकट लिया और चिडिया घर के अंदर प्रवेश कर गए। हमारी मुलाकात सबसे पहले हिरनों के झुंड से हुई।बेटी तो देख कर प्रसन्न हो गई। हम वहाँ से आगे बढ़े तो आगे सुंदर हंस घूम रहे थे। वहाँ से आगे बढे तो दाहिनी तरफ मगरमच्छों का बाड़ा था। हल्की गुनगुनी धूप मेँ मगरमच्छ लेटे हुए धूप सेंक रहे थे। देखने मेँ लग रहा था कि मानो  प्राण ही न हों लेकिन पानी का ये सबसे खतरनाक शिकारी बस मौके की तलाश मेँ होता है। मगरमच्छ के बगल मेँ ही घडियालोँ का भी बाड़ा था। ये नई व्यवस्था थी। उनको बहुत ही प्राकृतिक रुप से रखा गया है। अन्यथा पहले इनको सरीसृप भवन मेँ ही साँपोँ के साथ रखा जाता था। सरीसृप भवन एक गोल सा भवन हे जिसमेँ चार दीवारो के साथ अलमारियाँ बनी हुई हैं। इन शीशे की अलमारियों मेँ विभिन्न तरह के सांप रखे हुए हैं। बीच मेँ एक बड़ा सा कूएँ  जैसा हिस्सा है। पहले इसे ही छोटे छोटे भागोँ मेँ विभाजित करके इसमेँ मगरमच्छ ओर घडियाल रखे जाते थे, लेकिन अब इस भवन मेँ केवल सांप हैं। घडियाल और मगरमच्छों को बाहर प्राकृतिक रुप से रखा गया है। थोडा आगे बढ़ने पर बाईं तरफएक बाड़े मेँ ढेर सारे जेबरा घूम रहे थे। पास में हीँ एक छोटी सी आइसक्रीम की दुकान थी। वहाँ पर हमने अपनी बेटी के लिए एक आइसक्रीम ली, जिसे वो ख़ुशी ख़ुशी खाने लगी। वहाँ से बाईं तरफ घूम कर वापस बढ़ने पर आगे चिडियों का बाड़ा था। बेटी तो रंग बिरंगे सुंदर सुंदर पक्षी देख कर किलकारी मारने लगी। वहाँ से आगे बढ़ने पर बगल मेँ सफ़ेद शेरोँ का बडा था। ये खूबसूरत किंतु खतरनाक शिकारी जानवर अपने बाड़े मेँ चहल कदमी कर रहे थे। आगे बढ़ने पर सरीसृप भवन था जिस मेँ भांति भांति के सांप रखे हुए थे। सरिसृप भवन के पीछे गैंडों के रहने का स्थान था। यह विशालकाय जानवर आराम से पानी मेँ पड़े हुए हल्की धूप का आनंद उठा रहा था। गैंडा देखने मेँ भले ही गंदा जानवर हो, लेकिन असल में यह बहुत ही सफाई पसंद जानवर होता है। यह प्रतिदिन एक ही स्थान पर मल त्याग करता है और उस स्थान पर मल त्याग करने के अलावा कभी नहीँ जाता। वहाँ से आगे बढ़ने पर एक बार फिर हिरनों का बाड़ा आगया।उसमें एक तरफ कुछ कृष्णमृग थे। जी हाँ वही कृष्ण मृग जिनको मारने पर सलमान खान को जेल हुई थी। इनके सींघ सीधे लंबे सुन्दर, शरीर काला और पेट सफेद होता है। वहीँ पर एक गोल चक्कर बना हुआ हे जिसके बीच मेँ एक हरक्यूलिस की प्रतिमा हे जिसमे हरक्यूलिस ने पृथ्वी को अपने कंधो पर उठा रखा है। वहाँ से आगे बढ़ने पर विशाल झील के किनारे पर पहुँच जाते हैं। इस झील के किनारे चलते हुए आप विभिन्न प्रकार के पक्षियों को उनके प्राकृतिक परिवेश मेँ देख सकते हैं। इसके बाद झील पर बने एक छोटे से सुन्दर पुल को पार करके हम जिराफ देखने पहुंचे। वहाँ चार जीराफ अपनी लंबी गर्दन उठाए अपने बाड़े मेँ घूम रहे थे। वहाँ से कुछ दूरी पर हिप्पोपोटामस का बाडा था। यह विशाल शाकाहारी जानवरअपना पूरा शरीर पानी मेँ डूबोए, सिर्फ अपने नथुने बाहर निकाल कर पड़ा हुआ था। यह जानवर शाकाहारी होते हुए भी बेहद आक्रामक होता है। एक वयस्क हिप्पोपोटामस का वजन चार टन तक हो सकता है, और इसे प्रतिदिन कम से कम 400 किलो चारे की आवश्यकता होती है। इसके बाद बारी आई जंगल के राजा यानि की शेर की। तीन अलग अलग बाड़े मेँ बादशाह सलामत अपनी अपनी पत्नियों के साथ विचरण कर रहे थे। कुछ लोग शोर मचा कर और अपने छाते हिलाकर बादशाह को अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश कर रहे थेलेकिन बादशाह पर उसका कोई फर्क नहीँ पड़ रहा था। शायद उनको इसकी आदत हो गई थी। यहाँ से कुछ आगे हाथियों के बाड़े थे। पृथ्वी का यह सबसे विशालकाय जानवर अपनी धुन मेँ खड़े खड़े मस्ती मेँ हिल रहा था। बचपन मेँ जब मैं यहाँ आया था मैंने हाथियोँ को पैसे दिए थे और बदले मेँ हाथी ने हमेँ नमस्कार किया था। वह व्यवस्था शायद खत्म कर दी गई है क्यूंकि ऐसी कोई व्यवस्था नहीँ दिखी। इसके बाद झील केकिनारे चलते चलते चलतेचिडिया घर के मुख्य द्वार तक वापस आ गए। और हाँ,  एक मजेदार बातोँ भूल ही गया... हमने अपनी बेटी को कैरी बैग मेँ लटका रखा था। श्रीमती जी के थक जाने पर थोड़ी देर मैंने उसे अपने ऊपर लटका लिया। पर जब एक दूसरे दंपति ने यह देखा तो पत्नी अपने पति से लड़ने लागी कि तुम भी क्यों नहीँ अपनेबच्चे को एेसे ही लेकर घूमते हो। इसके बाद हम चिडिया घर से बाहर निकल गए। सडक दूसरी तरफ चिडियाघर का ही एक एक्सटेंशन है। यह चिडिया घर का मछली घर है। इसके लिए अलग से टिकट लगता है। हलाँकि की शाम हो रही थी लेकिन हमने टिकट लिया और मछली घर के अंदर घुस गए। रंग बिरंगी खूबसूरत मछलियोँ को देख कर मन प्रसन्न हो गया। सबसे ज्यादा प्रसन्न हुई मेरी बेटी। सारा घूमने ओर मछली  देखने के बाद भी वह बाहर आने को तैयार की नहीँ हो रही थी। बडी मुश्किल से उसे लेकर बाहर निकल सके। बाहर निकल कर हमने टेक्सी ली और वापस हो लिये।
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