आज सुबह सुबह मैं जल्दी उठा ताकि काजीरंगा नेशनल पार्क में हाथी बुकिंग कर सकूं। होटल वाले ने मुझे रात में ही बता दिया था कि हाथियों की एडवांस बुकिंग चलती है। लेकिन अगर जल्दी जाएं और किस्मत साथ दे तो मिलने की संभावना बन सकती है। सफारी जीप के मुकाबले हाथी पर बेहतर होती है क्योंकि हाथी पर जानवरों के दिखने की संभावना अधिक होती है। मैंने मोटरसाइकिल उठाई और पूछता हुआ स्थानीय सफारी बुकिंग ऑफिस में पहुंचा। वहां जाकर पता चला कि ऑफिस साढ़े छः बजे खुलता है और अभी छः बज रहे थे।
बगल में ही स्थानीय लोग छोटे-छोटे स्टाल लगाकर नाश्ता बेच रहे थे। मैंने भी पूरी छोले आमलेट का नाश्ता कर लिया। वहां पर ढेर सारे सफारी जीप वाले अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। इसी बीच एक विदेशी जोड़ा भी आया और ऑफिस खुलने की प्रतीक्षा करने लगा। पौने सात में लोग लाइन लगाने लगे तो मैं भी जाकर लाइन में लग गया।
एक जीप में कुल 6 व्यक्ति बैठ सकते थे और किराया अलग अलग जोन के लिए अलग अलग था। मुझे अच्छा नहीं लग रहा था कि मैं अकेले अपने लिए पूरी जीप हायर करूं, लेकिन और कोई रास्ता भी नहीं था। लाइन में मेरे आगे वह विदेशी जोड़ा था। बुकिंग क्लर्क समझदार था। उसने मुझे उस विदेशी जोड़े के साथ एडजस्ट कर दिया जिससे कि मुझे एक तिहाई ही किराया देना पड़ा। पूछने पर पता चला कि वह जर्मनी के जैक और लीना डेकट हैं। हमने बुकिंग क्लर्क की सलाह पर वेस्टर्न रेंज का ट्रिप बुक कर लिया। मैंने मोटरसाइकिल वहीं बुकिंग ऑफिस के बगल में पार्क कर दी और जीप में सवार हो गया।
सुबह सुबह का समय था। हल्की हल्की ठंड थी।लेकिन जब जीप चल पड़ी तो ठंड से मेरी हालत खराब होने लगी और थोड़ी ही देर में मैं बुरी तरह से कांपने लगा। मुझे लगा था कि सफारी में गाड़ी की गति 20 के ऊपर नहीं होगी इसलिए हवा से ठंड नहीं लगेगी। लेकिन जो बात मुझे नहीं पता थी वह यह थी कि सफारी के प्रवेश द्वार बुकिंग कार्यालय से काफी दूरी पर थे। लगभग 10 किलोमीटर तक मुझे ऐसे ही ठिठुरते हुए यात्रा करनी पड़ी। उसके बाद गाड़ी प्रवेश द्वार पर पहुंची और वहां पर वाहन चालक महोदय ने गाड़ी को लाइन में खड़ा कर दिया और खुद कार्यालय में औपचारिकताएं पूरी करने चले गए।
हम लोग वहीं पर खड़े खड़े बातें करते रहे और आसपास के नज़ारे देखते रहे। बिल्कुल दिल्ली के इंडिया गेट टाइप का माहौल बना हुआ था। एक से एक नमूने इकट्ठा हुए पड़े थे। कुछ हाथी, हाथी पर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे तो कुछ गधे जीप पर चढ़कर शोर मचा रहे थे। मैंने गधा इसलिए कहा क्योंकि जीव अभयारण्य में शोर नहीं मचाना चाहिए।
थोड़ी देर में वाहन चालक महोदय जरूरी औपचारिकताएं पूरी कर के आए और हमने काजीरंगा नेशनल पार्क में प्रवेश किया। जंगल में प्रवेश करते ही सबसे पहले हमारा सामना पालतू हाथियों के झुंड से हुआ जिनको जिनको वनरक्षक लेकर जंगल के अंदर गश्त लगाने जा रहे थे। झुंड में वयस्क हाथियों के अलावा दो बड़े प्यारे छोटे छोटे बच्चे भी थे। आगे बढ़ने पर थोड़ी देर में ही घना जंगल शुरू हो गया। सुबह-सुबह काफी घना कोहरा भी छाया हुआ था इसलिए बहुत कम दूरी तक दिखाई दे रहा था। मन में निराशा हो रही थी कि कोहरे में दूर स्थित जीव जंतु कैसे दिखाई देंगे। लेकिन इस मामले में हम कुछ नहीं कर सकते थे।
जंगल में सबसे पहले हमें रंग बिरंगे जंगली मुर्गे के दर्शन हुए। वह पगडंडी के बिल्कुल बगल में ही था इसलिए उसकी अच्छी तस्वीरें आईं। उसके बाद सफेद और काले गर्दन वाले सारस के दर्शन हुए। लेकिन निगाहें कभी उस जानवर को खोज रही थी जिसके लिए काजीरंगा नेशनल पार्क मशहूर है, अर्थात एक सींग वाला गैंडा। हमें बहुत ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। थोड़ा आगे जाते ही पगडंडी से लगभग सौ मीटर की दूरी पर एक मादा गैंडा अपने बच्चे के साथ घास चरती नजर आई। बहुत ज्यादा कोहरे के कारण तस्वीरें अच्छी नहीं आई लेकिन इतने बड़े जानवरों को उनके प्राकृतिक परिवेश में देखना ही बहुत ही आनंदायक था। गैंडे आराम से चर रहे थे और बगुले मजे से उनकी सवारी कर रहे थे।
थोड़ा आगे जाने पर जंगली सूअर की एक झलक मिली। अब कोहरा साफ हो चला था और दृश्यता काफी बढ़ गई थी। आगे दलदली इलाके में पहुंचे जहां पर काफी सारे जल पक्षी दिखाई दिये। एक किंगफिशर झाड़ी के ऊपर शिकार की ताक में घात लगाए बैठा था तो एक पनडुब्बी पानी के अंदर से मछली का शिकार करके केवल अपनी गर्दन पानी के ऊपर निकालकर खा रही थी। शरीर पानी के अंदर होने के कारण ऐसा लग रहा था जैसे कोई सांप मछली खा रहा हो। थोड़ा आगे बढ़ने पर जंगली भैंसों का एक झुंड नजर आया। जंगली भैंसे बहुत खतरनाक होते हैं। इनके झुंड पर हमला करने से शेर भी डरता है। झुंड में काफी बच्चे भी थे। इन काले काले भैसों के बच्चे हल्के सुनहरे रंग के होते हैं और जैसे-जैसे आयु बढ़ती है ये काले होते जाते हैं। इनसे थोड़ी ही दूर पर एक जंगली सूअर पूरे शान से भोजन की तलाश में जुटा हुआ था। जीप के पास आने पर भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ा जिससे हमें फोटो लेने का अच्छा मौका मिल गया। का
जीरंगा अपने big4 अर्थात 4 बड़े जानवरों के लिए प्रसिद्ध है। अब तक हम इनमें से हाथी गैंडा और जंगली भैंसा, इन तीन के दर्शन कर चुके थे। केवल एक बाघ के दर्शन करने ही रह गए थे। पूरी सफारी खत्म होने तक बाघ महाशय ने दर्शन नहीं दिए। लगभग दस बजे हम सफारी से बाहर निकले। मेरा इरादा दोपहर बाद यहां से निकलने का था क्योंकि आज केवल शिवसागर पहुंचना था जो कि लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर की ही दूरी पर था। चुंकि मेरे पास समय था और जैक और लीना तो आए ही घूमने थे सो हमने सेन्ट्रल रेंज का भी एक ट्रिप बुक कर लिया।
सेंट्रल रेंज में हमने कछुए, जंगली हाथी, बाज, नीलकंठ, और भी ढेर सारे गैंडे और बहुत ही प्रकार के जल पक्षी देखे। जंगली और पालतू हाथियों में अंतर करने का एक बहुत ही आसान तरीका हमारे वाहन चालक ने बताया। उसने बताया जो हाथी काले दिखें वह पालतू होते हैं और जो शरीर पर मिट्टी और कीचड़ की वजह से भूरे दिखें वह जंगली होते हैं। वह इसलिए क्योंकि पालतू हाथियों की नियमित रूप से साफ सफाई की जाती है। बाघ महाशय को तो न दिखना था न दिखे। सेंट्रल रेंज के अंत में जंगली भैंसों का एक बहुत बड़ा झुंड हमारे बहुत पास से गुजरा जिससे बाघ न दिखने का दुख थोड़ा कम हो गया। वेस्टर्न रेंज पूरा करते-करते बारह बज गए और भूख बहुत जोर की लगने लगी।
हमने एक साथ भोजन किया फिर दोनो मित्रों से विदा लेकर अपनी यात्रा पर आगे बढ़ा। शिवसागर पहुंचने तक शाम के सात बज गए थे। अपनी पूरी यात्रा का सबसे साफ सुथरा और सबसे सस्ता होटल मुझे शिव सागर में ही मिला इसलिए कोई मोल भाव किए बिना रूम ले लिया। थोड़ी देर आराम करने के पश्चात बाहर निकला और मछली भात खा कर वापस आया। आज के चित्र आप पिछली पोस्ट में देख चुके हैं फिर भी बिना फोटो के पोस्ट अच्छी नहीं लगती इसलिए कुछ तस्वीरें लगा दे रहा हूँ।
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| बुकिंग ऑफिस के पीछे चाय बगान |
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| बस स्टाइल मार रहा हूँ |
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| सेंट्रल रेंज में प्रवेश |
| शान की सवारी |
| नीलकंठ |
| आज के मित्र |
| जंगली हाथी |
| बायसन |
| बायसन के बच्चे |
| शिकार की तलाश में |
| घात लगाए किंग फिशर |
| सफारी को तैयार हाथी |
| ड्यूटी पर......... |



