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शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

दो पहियों पर पूर्वोत्तर : सातवां पड़ाव : शिबसागर

आज सुबह सुबह मैं जल्दी उठा ताकि काजीरंगा नेशनल पार्क में हाथी बुकिंग कर सकूं। होटल वाले ने मुझे रात में ही बता दिया था कि हाथियों की एडवांस बुकिंग चलती है। लेकिन अगर जल्दी जाएं और किस्मत साथ दे तो मिलने की संभावना बन सकती है। सफारी जीप के मुकाबले हाथी पर बेहतर होती है क्योंकि हाथी पर जानवरों के दिखने की संभावना अधिक होती है। मैंने मोटरसाइकिल उठाई और पूछता हुआ स्थानीय सफारी बुकिंग ऑफिस में पहुंचा। वहां जाकर पता चला कि ऑफिस साढ़े छः बजे खुलता है और अभी छः बज रहे थे। बगल में ही स्थानीय लोग छोटे-छोटे स्टाल लगाकर नाश्ता बेच रहे थे। मैंने भी पूरी छोले आमलेट का नाश्ता कर लिया। वहां पर ढेर सारे सफारी जीप वाले अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। इसी बीच एक विदेशी जोड़ा भी आया और ऑफिस खुलने की प्रतीक्षा करने लगा। पौने सात में लोग लाइन लगाने लगे तो मैं भी जाकर लाइन में लग गया। एक जीप में कुल 6 व्यक्ति बैठ सकते थे और किराया अलग अलग जोन के लिए अलग अलग था। मुझे अच्छा नहीं लग रहा था कि मैं अकेले अपने लिए पूरी जीप हायर करूं, लेकिन और कोई रास्ता भी नहीं था। लाइन में मेरे आगे वह विदेशी जोड़ा था। बुकिंग क्लर्क समझदार था। उसने मुझे उस विदेशी जोड़े के साथ एडजस्ट कर दिया जिससे कि मुझे एक तिहाई ही किराया देना पड़ा। पूछने पर पता चला कि वह जर्मनी के जैक और लीना डेकट हैं। हमने बुकिंग क्लर्क की सलाह पर वेस्टर्न रेंज का ट्रिप बुक कर लिया। मैंने मोटरसाइकिल वहीं बुकिंग ऑफिस के बगल में पार्क कर दी और जीप में सवार हो गया। सुबह सुबह का समय था। हल्की हल्की ठंड थी।लेकिन जब जीप चल पड़ी तो ठंड से मेरी हालत खराब होने लगी और थोड़ी ही देर में मैं बुरी तरह से कांपने लगा। मुझे लगा था कि सफारी में गाड़ी की गति 20 के ऊपर नहीं होगी इसलिए हवा से ठंड नहीं लगेगी। लेकिन जो बात मुझे नहीं पता थी वह यह थी कि सफारी के प्रवेश द्वार बुकिंग कार्यालय से काफी दूरी पर थे। लगभग 10 किलोमीटर तक मुझे ऐसे ही ठिठुरते हुए यात्रा करनी पड़ी। उसके बाद गाड़ी प्रवेश द्वार पर पहुंची और वहां पर वाहन चालक महोदय ने गाड़ी को लाइन में खड़ा कर दिया और खुद कार्यालय में औपचारिकताएं पूरी करने चले गए। हम लोग वहीं पर खड़े खड़े बातें करते रहे और आसपास के नज़ारे देखते रहे। बिल्कुल दिल्ली के इंडिया गेट टाइप का माहौल बना हुआ था। एक से एक नमूने इकट्ठा हुए पड़े थे। कुछ हाथी, हाथी पर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे तो कुछ गधे जीप पर चढ़कर शोर मचा रहे थे। मैंने गधा इसलिए कहा क्योंकि जीव अभयारण्य में शोर नहीं मचाना चाहिए। थोड़ी देर में वाहन चालक महोदय जरूरी औपचारिकताएं पूरी कर के आए और हमने काजीरंगा नेशनल पार्क में प्रवेश किया। जंगल में प्रवेश करते ही सबसे पहले हमारा सामना पालतू हाथियों के झुंड से हुआ जिनको जिनको वनरक्षक लेकर जंगल के अंदर गश्त लगाने जा रहे थे। झुंड में वयस्क हाथियों के अलावा दो बड़े प्यारे छोटे छोटे बच्चे भी थे। आगे बढ़ने पर थोड़ी देर में ही घना जंगल शुरू हो गया। सुबह-सुबह काफी घना कोहरा भी छाया हुआ था इसलिए बहुत कम दूरी तक दिखाई दे रहा था। मन में निराशा हो रही थी कि कोहरे में दूर स्थित जीव जंतु कैसे दिखाई देंगे। लेकिन इस मामले में हम कुछ नहीं कर सकते थे। जंगल में सबसे पहले हमें रंग बिरंगे जंगली मुर्गे के दर्शन हुए। वह पगडंडी के बिल्कुल बगल में ही था इसलिए उसकी अच्छी तस्वीरें आईं। उसके बाद सफेद और काले गर्दन वाले सारस के दर्शन हुए। लेकिन निगाहें कभी उस जानवर को खोज रही थी जिसके लिए काजीरंगा नेशनल पार्क मशहूर है, अर्थात एक सींग वाला गैंडा। हमें बहुत ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। थोड़ा आगे जाते ही पगडंडी से लगभग सौ मीटर की दूरी पर एक मादा गैंडा अपने बच्चे के साथ घास चरती नजर आई। बहुत ज्यादा कोहरे के कारण तस्वीरें अच्छी नहीं आई लेकिन इतने बड़े जानवरों को उनके प्राकृतिक परिवेश में देखना ही बहुत ही आनंदायक था। गैंडे आराम से चर रहे थे और बगुले मजे से उनकी सवारी कर रहे थे। थोड़ा आगे जाने पर जंगली सूअर की एक झलक मिली। अब कोहरा साफ हो चला था और दृश्यता काफी बढ़ गई थी। आगे दलदली इलाके में पहुंचे जहां पर काफी सारे जल पक्षी दिखाई दिये। एक किंगफिशर झाड़ी के ऊपर शिकार की ताक में घात लगाए बैठा था तो एक पनडुब्बी पानी के अंदर से मछली का शिकार करके केवल अपनी गर्दन पानी के ऊपर निकालकर खा रही थी। शरीर पानी के अंदर होने के कारण ऐसा लग रहा था जैसे कोई सांप मछली खा रहा हो। थोड़ा आगे बढ़ने पर जंगली भैंसों का एक झुंड नजर आया। जंगली भैंसे बहुत खतरनाक होते हैं। इनके झुंड  पर हमला करने से शेर भी डरता है। झुंड में काफी बच्चे भी थे। इन काले काले भैसों के बच्चे हल्के सुनहरे रंग के होते हैं और जैसे-जैसे आयु बढ़ती है ये काले होते जाते हैं। इनसे थोड़ी ही दूर पर एक जंगली सूअर पूरे शान से भोजन की तलाश में जुटा हुआ था। जीप के पास आने पर भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ा जिससे हमें फोटो लेने का अच्छा मौका मिल गया। का जीरंगा अपने big4 अर्थात 4 बड़े जानवरों के लिए प्रसिद्ध है। अब तक हम इनमें से हाथी गैंडा और जंगली भैंसा, इन तीन के दर्शन कर चुके थे।  केवल एक बाघ के दर्शन करने ही रह गए थे। पूरी सफारी खत्म होने तक बाघ महाशय ने दर्शन नहीं दिए। लगभग दस बजे हम सफारी से बाहर निकले। मेरा इरादा दोपहर बाद यहां से निकलने का था क्योंकि आज केवल शिवसागर पहुंचना था जो कि लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर की ही दूरी पर था। चुंकि मेरे पास समय था और जैक और लीना तो आए ही घूमने थे सो हमने सेन्ट्रल रेंज का भी एक ट्रिप बुक कर लिया। सेंट्रल रेंज में हमने कछुए, जंगली हाथी, बाज, नीलकंठ, और भी ढेर सारे गैंडे और बहुत ही प्रकार के जल पक्षी देखे। जंगली और पालतू हाथियों में अंतर करने का  एक बहुत ही आसान तरीका हमारे वाहन चालक ने बताया। उसने बताया जो हाथी काले दिखें  वह पालतू होते हैं और जो शरीर पर मिट्टी और कीचड़ की वजह से भूरे दिखें वह जंगली होते हैं। वह इसलिए क्योंकि पालतू हाथियों की नियमित रूप से साफ सफाई की जाती है। बाघ महाशय को तो न दिखना था न दिखे। सेंट्रल रेंज के अंत में जंगली भैंसों का एक बहुत बड़ा झुंड हमारे बहुत पास से गुजरा जिससे बाघ न दिखने का दुख थोड़ा कम हो गया। वेस्टर्न रेंज पूरा करते-करते बारह बज गए और भूख बहुत जोर की लगने लगी। हमने एक साथ भोजन किया फिर दोनो मित्रों से विदा लेकर अपनी यात्रा पर आगे बढ़ा। शिवसागर पहुंचने तक शाम के सात बज गए थे। अपनी पूरी यात्रा का सबसे साफ सुथरा और सबसे सस्ता होटल मुझे शिव सागर में ही मिला इसलिए कोई मोल भाव किए बिना रूम ले लिया। थोड़ी देर आराम करने के पश्चात बाहर निकला और मछली भात खा कर वापस आया। आज के चित्र आप पिछली पोस्ट में देख चुके हैं फिर भी बिना फोटो के पोस्ट अच्छी नहीं लगती इसलिए कुछ तस्वीरें लगा दे रहा हूँ।
बुकिंग ऑफिस के पीछे चाय बगान


बस स्टाइल मार रहा हूँ

सेंट्रल रेंज में प्रवेश


शान की सवारी

नीलकंठ

आज के मित्र

जंगली हाथी

बायसन


बायसन के बच्चे

शिकार की तलाश में

घात लगाए किंग फिशर

सफारी को तैयार हाथी




ड्यूटी पर.........


मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

दो पहियों पर पूर्वोत्तर : छठा पड़ाव : काजीरंगा नेशनल पार्क, कोहरा

28 नवंबर 2018 बुधवार
गोहाटी

आज केवल दो सौ कीलोमीटर जाना था सो आराम से देर तक सोता रहा। आराम से दस बजे तक सोता रहा फिर हाथ मुंह धोकर मोटरसाइकिल उठाया और बाहर निकला। इरादा था कि उमानंद मंदिर जाया जाए। यह मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीचो-बीच एक टापू पर है। नाव वाले यहां तक आने जाने का किराया ₹100 लेते हैं। मुझे मंदिर में कुछ कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। केवल ब्रह्मपुत्र का आनंद लेना था। मैं मोटरसाइकिल लेकर ब्रह्मपुत्र के किनारे किनारे उमानंद मंदिर जाने वाले फेरी घाट की तरफ बढ़ रहा था तब तक एक बोर्ड दिखा। “गोहाटी मध्यम कांडा फेरी सर्विस”। हमने कहा बस इसी की तो जरूरत थी। ये सेवाएं दैनिक यात्रियों के लिए चलती है इसलिए काफी सस्ती होनी चाहिएं। मैंने उस गेट में बाइक घुसा दी। बाइक अंदर घुसाते ही सामने खुला मैदान था और उसके बाद नदी थी। नदी में एक तरफ एक छोटा सा कंक्रीट का प्लेटफार्म बना कर उसके ऊपर लचित बोरफुकान और उसके साथियों की मूर्तियां लगी हुई थी। लचित बोरफुकान अहोम साम्राज्य के बहुत बड़े सेनापति हुए हैं जिन्होंने मुगलों को नाकों चने चबा दिए थे और उनको पूर्वोत्तर में घुसने नहीं दिया। आज भी एनडीए में बेस्ट कैडेट को लचित बोरफुकान अवार्ड दिया जाता है। एक तरफ फ्लोटिंग घाट बना हुआ था। मैं मोटरसाइकिल लेकर उसमें घुस गया। थोड़ी देर में नाव आई तो मैं मोटरसाइकिल लेकर नाव में चढ़ने लगा। दरवाजे पर टिकट कंडक्टर बैठा हुआ था। चुंकि मुझे पता तो था नहीं कि कितने पैसे लगते हैं इसलिए मैंने उसकी तरफ सौ का नोट बढ़ा दिया। और शायद वह भी इस बात को समझ गया इसलिए उसने मुझसे तुरंत पूछा खुला दस का नोट नहीं है? मैंने तुरंत उससे सौ का नोट वापस लिया और 10 का नोट पकड़ा दिया। लेकिन यह क्या उसने उस ₹10 में से भी ₹3 वापस किए। यानी कि मोटरसाइकिल समेत ब्रह्मपुत्र पार करने का किराया कुल ₹7। कहां बिना मोटरसाइकिल के मैं ₹100 देने वाला था और कहां केवल सात और सात कुल ₹14 में अपना काम हो गया। बोट में बैठकर में नदी के नजारे लेने लगा। थोड़ी देर में एक मुढ़ी वाला आकर बोट पर ही अपना खोमचा से लगा कर मुढ़ी बेचने लगा मैंने भी ₹10 का एक दोना ले लिया और खाते हुए प्रकृति का आनंद लेने लगा। थोड़ी देर में ही बोट चल पड़ी और करीब 15-20 मिनटों में लहरों को चीरते हुए दूसरे छोर पर पहुंचा। दिया सुबह से कुछ नाश्ता भी नहीं किया था इसलिए बाइक लेकर नजदीक के बाजार में पहुंच गया। एक छोटी सी नाश्ते की दुकान में बैठा और पता किया कि नाश्ते में क्या उपलब्ध है। वहां पर रोटी और छोले उपलब्ध थे। मैंने साथ में एक आमलेट की बनवा लिया और आराम से बैठकर नाश्ते का आनंद लिया। नाश्ता निपटा कर फिर उसी रास्ते वापसी के लिए चल पड़े। ₹7 का टिकट लेकर बाइक समेत नाव पर सवार हो गया। लेकिन नाव के चलने में भी काफी समय बाकी था सो नाव के कोने में खड़ा होकर फोन में व्यस्त हो गया। अनायास ही निगाहें नदी के विशाल जल साम्राज्य की तरफ उठ जाती थी। तभी अचानक थोड़ी दूरी पर मुझे पानी में हलचल नजर आई। मैंने फोन के चक्कर में उस पर ध्यान नहीं दिया थोड़ी देर बाद निगाह उठाई तो वैसे ही हलचल दूसरी जगह हो रही थी। मैंने फोन को जेब में रखा और पानी पर ध्यान से देखने लगा। थोड़ी देर में मुझसे करीब 200 मीटर की दूरी पर एक बार फिर वही हलचल हुई और जो चीज नजर आई वह देख कर मैं उछल पड़ा। जी हां, वह एक फ्रेश वाटर डॉल्फिन थी। फिर तुम्हें फोन वोन भूल गया और लगातार पानी में डॉल्फिन्स को देखने लगा। थोड़ी देर में वो पानी में से अपनी लंबी थूथन निकालतीं और छोटी सी छलांग मार कर गुम हो जातीं। लगभग आधे घंटे बाद नाव वहां से खुली और तब तक मैं डॉल्फिन्स की अठखेलियों में ही गुमा रहा। मैंने गलती से भी फोटो लेने की कोशिश नहीं की, क्योंकि मुझे पता था कि इसका कोई लाभ नहीं होगा। चारों तरफ फैली अथाह जल राशि में डॉल्फिन कहां नजर आएगी कुछ पता नहीं था। और जब नजर आती तब कैमरा घुमाने का मौका दिए बिना पानी में गायब हो जातीं। नाव से उतर कर लगभग 12:00 बजे में होटल पहुंचा। वहां से फटाफट चेक आउट किया, अपना सामान लादा, गूगल गाइडेंस देवता को काजीरंगा नेशनल पार्क को लक्ष्य बनाने को कहा और उनके बताए रास्ते पर मोटरसाइकिल दौड़ा दिया। रास्ते में एक जगह निकॉन की एजेंसी नजर आई तो वहां रुक कर लगभग ₹3000 का एक ट्राइपॉड ख़रीदा। क्योंकि जैसा आपको पता है पिछला ट्राइपॉड पिछली रात को टूट चुका था। शहर की भीड़भाड़ से बाहर निकल कर नेशनल हाईवे नंबर 3 पकड़ कर मैं आगे बढ़ा। शानदार चार लेन की सड़क थी। अच्छी स्पीड मिल रही थी मैं बढ़ता चला गया। रास्ते में जगह-जगह सड़क के किनारे स्थानीय विक्रेता अनानास और संतरे बेच रहे थे। हालांकि मैंने दबाकर नाश्ता किया हुआ था लेकिन मुझे अनानास बहुत पसंद है इसलिए कुछ दूर जाने के बाद एक जगह रुका और बिना मोलतोल किए एक अनानास का ऑर्डर दे दिया। दुकानदार ने बढ़िया से उसको छील काटकर उसके टुकड़े करके मुझे दे दीए। मैंने पॉलिथीन पकड़ा और वही खड़े खड़े उससे बातें करते हुए सारा निपटा दिया। अब पेट में मामला गंभीर हो गया था इसलिए मैं एक बार फिर मोटरसाइकिल पर बैठा और आगे बढ़ा। बात की बात में मैं नगांव पार कर गया कालियाबोर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा हो गया था और गूगल देवता अभी भी मेरा लक्ष्य 30 किलोमीटर दूर बता रहे थे। मैं बढ़ता रहा। थोड़ी देर बाद ही जंगल शुरू हो गया। जंगल में बड़े-बड़े नियंत्रित गति की चेतावनी के बोर्ड लगे हुए थे। हम भारत के एक बहुत ही महत्वपूर्ण अभ्यारण में प्रवेश कर चुके थे इसलिए वहां पर नियंत्रित गति में चलना बहुत ही महत्वपूर्ण था। अधिकतम गति 40 किलोमीटर प्रति घंटे की थी जिस का उल्लंघन करने पर न्यूनतम जुर्माना ₹5000 था। यही नहीं हर 1 किलोमीटर पर रंबल स्ट्रिप स्पीड ब्रेकर बने हुए थे जहां पर आपको वाहन 20 की स्पीड में चलाना था। मैं ठहरा नियम कानूनों को मानने वाला व्यक्ति। गति सीमा के अंदर गाड़ी चलाता हुआ उस जगह पहुंचा जहां पर गूगल महाराज ने कह दिया कि लो भाई तुम्हारा लक्ष्य आ गया। रात के लगभग 8:00 बजे जंगल के बीचो बीच मैं  बेवकूफ की तरह  खड़ा होकर आसपास देख रहा था। जब सिवाय अंधेरे और पेड़ों के और कुछ नहीं दिखा तो मैंने बाइक आगे बढ़ा दी। काजीरंगा नेशनल पार्क का कार्यालय और नजदीकी बाजार कोहरा वहां से लगभग 25 किलोमीटर है। लगभग 9:30 बजे मैं कोहरा पहुंचा। होटल में कमरा कम से कम 1800 का था। मैंने मोलभाव शुरू किया और अंत में वह कमरा मुझे ₹1000 में मिल गया। कमरा निस्संदेह बहुत ही शानदार था लेकिन मेरे बजट के बाहर था। मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था इसलिए मैंने ले लिया। सामान रख कर हाथ मुंह धोया और खाने की तलाश में बाहर निकला। हालांकि उस होटल में भी रेस्टोरेंट था लेकिन अपना सिद्धांत है कि जिस होटल में रुकिए उसमें खाना मत खाइए। होटल से करीब 100 मीटर दूर एक छोटा सा ढाबा मिला जहां पर तड़का रोटी और आमलेट का डिनर किया। वापस आया और बिस्तर के हवाले हो गया।

जै जै
संतरे अनानास की अस्थाई दुकान

महान योद्धा लचित बोरफुकान

टूरिस्ट क्रूजर

उमानंद मंदिर का द्वीप

शुक्रेश्वर महादेव

दूर से आती हमारी नाव

लो जी नजदीक आ गई

नाव पर सवार हमारा वृषभ

नाव पर झाल मुढ़ी

मांगी नाव न केवट आना

पानी को काटती हमारी नाव

दूर एक मंदिर

उस पार के दृष्य

उस पार के दृष्य






तड़का रोटी भुजिया चटनी प्याज



बुधवार, 9 जनवरी 2019

दो पहियों पर पूर्वोत्तर : पांचवां पड़ाव : गोहाटी

27 नवंबर 2018 मंगलवार
नलबाड़ी  
कल एक दिन में 470 कीलोमीटर यात्रा कर लेने से मेरे उपर दबाव काफी कम हो गया था। अब मुझे पांच दिनों में मात्र पांच सौ कीलोमीटर ही जाने की अनिवार्यता थी। सो आराम से आठ बजे तक सोता रहा। तैयार होने के बीच में ही बबीता कोमल जी का संदेश आया कि मैं कहा हूँ। मैंने बताया कि बस पंद्रह मिनट में आपकी सेवा में प्रस्तुत होता हूँ। उनके द्वारा भेजे गए लोकेशन को फालो करता हुआ मैं उनकी दुकान पर उनके श्वसुर जी के पास जा पहुंचा। वो बड़े ही प्रेम से मिले। मेरे बारे में सारी जानकारी ली और दुकान के एक कर्मचारी के साथ मुझे घर भेज दिया। घर पर बबीता जी और उनके पतिदेव मिले। काफी समय तक अलग अलग मुद्दों पर चर्चा हुई। फिर उन्होंने शानदार लंच कराया। उनकी पुस्तक और फिर मिलने के वादे के साथ मैंने उनसे विदा ली। आज का लक्ष्य गुवाहाटी था जो कि वहाँ से हाइवे के रास्ते जाने पर लगभग 70 कीलोमीटर था। बबीता जी ने मुझे हाइवे के बजाय हाजो होकर जाने की सलाह दी क्योंकि वहां हयग्रीव माधव का मंदिर था। साथ ही यह मार्ग लगभग दस कीलोमीटर छोटा भी था। मुझे बिना पत्नी के मंदिर जाना बिल्कुल पसंद नहीं क्योंकि विवाह का एक वचन ये भी होता कि मैं तुम्हे साथ लिये बिना कभी भी तीर्थयात्रा नहीं करूंगा। पूरी यात्रा में यहीं एक मंदिर था जहाँ मैंने दर्शन किये। इस मंदिर का निर्माण सोलहवीं शताब्दी में राजा रघुदेव नारायण ने कराया था। यहाँ भगवान विष्णु की पूजा हयग्रीव (जिसकी गर्दन घोड़े की हो) के रूप में की जाती है। इसके पीछे एक कथा आती है कि भगवान ने यह रूप ले कर हयग्रीव नाम के ही एक दैत्य का वध कर वेदों की रक्षा की थी। मंदिर मणिकूट नाम की छोटी सी पहाड़ी पर बना हुआ है। मंदिर बहुत ही कलात्मक है और दीवारों पर बहुत ही सुंदर सुंदर कलाकृतियां बनी हुई है। जब मैं पहुंचा तो वह भगवान के भोग लगाने का समय था इसलिए मुझे प्रतीक्षा करनी पड़ी। भोग के समय के पश्चात पुजारी जी ने मुझे बहुत ही अच्छे से दर्शन करवाए। वहां से प्रसाद पाकर मैं आगे बढ़ा। कुछ आगे जाने पर मुझे ब्रह्मपुत्र के प्रथम दर्शन हुए। ब्रह्मपुत्र के किनारे किनारे ही चलता हुआ मैं गोहाटी के पास पहुंचा। अब मुझे सिर्फ पुल पार करना था और मैं गोहाटी में होता। पहले गोहाटी में जाने के लिए सिर्फ एक पुल था जोकि एक रेल-सह-सड़क पुल है। लेकिन अब इसके ठीक बगल में एक नया पुल बन गया है। पुराने पुल को अब एक लेन के लिए प्रयोग करते हैं और नए पुल को दूसरी लेन के लिए। जब मैं इस पुल पर पहुंचा तब शाम का समय था और सूर्यास्त होने ही वाला था। मैं जिस लेन में था वह पूर्व दिशा में थी इस कारण से सूर्यास्त के फोटो अच्छे नहीं आते। मैंने तेजी से पुल को पार किया, यू टर्न लिया और नए पुल के रास्ते ब्रह्मपुत्र के बीच में आ खड़ा हुआ। मुख्य लेन के किनारे पैदल और साइकिल वालों के लिए एक अलग लेन बनी हुई है जिसे करीब 4 फुट की बाउंड्री से अलग किया गया है। मैं उस बाउंड्री को फांद कर पैदल लेन में पहुंचा। ट्राइपाड लगा कर कैमरे को सेट किया और सूर्यास्त की फोटो लेना शुरू कर दिया। लंबी चौड़ी ब्रह्मपुत्र में सूर्यास्त का दृश्य बहुत ही प्यारा लग रहा था। सूर्यास्त के बाद इधर उधर की कुछ तस्वीरें खींची और एक बार फिर पुल पार करके यू टर्न लिया और फिर पुल को पार किया। अब मैं गुवाहाटी में प्रवेश कर चुका था। क्योंकि शाम का समय था इसलिए ट्रैफ़िक काफी हैवी था। मैं धीमी गति से ही आगे बढ़ता रहा और जल्दी ही शहर के अंदर पहुंच गया। भारालूमुख एरिया में एक होटल लिया। होटल में सामान रखा, मोटरसाइकिल उठाया और ऐसी जगह की तलाश में निकला जहां से गुवाहाटी शहर का रात में फोटो लिया जा सके। गूगल में एक हिल टॉप व्यू प्वाइंट नाम की जगह दिखा रहा था मैं वही पहुंचा। लेकिन वहां से गुवाहाटी शहर का कुछ हिस्सा ही दिखाई दे रहा था। बाकी हिस्सा पेड़ों से ब्लॉक हो गया था। जैसे तैसे मैंने फोटो लिए और वापस नीचे गुवाहाटी शहर में आया। एक मित्र की सलाह पर मैं शुक्रेश्वर महादेव मंदिर पहुंचा ताकि ब्रह्मपुत्र के किनारे रात की फोटोग्राफी कर सकूं लेकिन इस मेहनत का भी कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। उसके पश्चात मैंने गूगल देवता की सहायता से स्थानीय भोजन देने वाले रेस्टोरेंटों की तलाश की और उनमें से एक में भोजन करने पहुंचा। मीनू देख कर मैं तय नहीं कर पा रहा था कि मैं क्या आर्डर करूं।असमिया भोजन की कम से कम आठ-दस तरह की थालियां उपलब्ध थीं। शाकाहारी थाली अलग थी, बंबू थाली अलग थी, चिकन थाली, मटन थाली, डक थाली, पोर्क थाली, मिक्स थाली आदि आदि भी उपलब्ध थीं। मैंने पोर्क थाली का ऑर्डर दिया। चावल के साथ दो या तीन शाकाहारी आइटम थे और कम से कम 8 पोर्क के आइटम थे। मैं आराम से मजे ले लेकर खाता रहा। वहां से खाना खाकर बाहर निकलते ही मेरे साथ एक छोटी सी दुर्घटना घट गई और मुझे ₹3000 का चूना लग गया। हुआ यह की जो पिट्ठू बैग था उसका चेन पूरा खुल गया था और मैंने ध्यान नहीं दिया। जब मैंने मोटरसाइकिल स्टार्ट करके घुमाई तो ट्राइपॉड गिर गया। जब तक मेरा ध्यान जाता और मैं गाड़ी खड़ी करके वापस आकर ट्राइपॉड उठाता, तब तक एक कार वाला ट्राइपॉड को रौंदता हुआ निकल गया। मैंने टूटे ट्राइपॉड को उठाया। उसके तीन टांगों में से दो शहीद हो चुकी थीं। मैंने उसकी तीसरी टांग भी तोड़ कर निकाल दी और अब मैं उसका इस्तेमाल मोनोपॉड के तौर पर करता हूं। बुझे मन से वापस होटल आया और बिस्तर के हवाले हो गया। जय जय
बबीता जी और बबली के साथ
बबीता जी के सौजन्य से.......


हयग्रीव माधव का प्रसाद

ब्रह्मपुत्र के पुल पर


हयग्रीव माधव मंदिर का मुख्यद्वार









ब्रह्मपुत्र के प्रथम दर्शन

पुल से











गोहाटी शहर

नदी के उस पार एक बोट