बुधवार, 9 जनवरी 2019

दो पहियों पर पूर्वोत्तर : पांचवां पड़ाव : गोहाटी

27 नवंबर 2018 मंगलवार
नलबाड़ी  
कल एक दिन में 470 कीलोमीटर यात्रा कर लेने से मेरे उपर दबाव काफी कम हो गया था। अब मुझे पांच दिनों में मात्र पांच सौ कीलोमीटर ही जाने की अनिवार्यता थी। सो आराम से आठ बजे तक सोता रहा। तैयार होने के बीच में ही बबीता कोमल जी का संदेश आया कि मैं कहा हूँ। मैंने बताया कि बस पंद्रह मिनट में आपकी सेवा में प्रस्तुत होता हूँ। उनके द्वारा भेजे गए लोकेशन को फालो करता हुआ मैं उनकी दुकान पर उनके श्वसुर जी के पास जा पहुंचा। वो बड़े ही प्रेम से मिले। मेरे बारे में सारी जानकारी ली और दुकान के एक कर्मचारी के साथ मुझे घर भेज दिया। घर पर बबीता जी और उनके पतिदेव मिले। काफी समय तक अलग अलग मुद्दों पर चर्चा हुई। फिर उन्होंने शानदार लंच कराया। उनकी पुस्तक और फिर मिलने के वादे के साथ मैंने उनसे विदा ली। आज का लक्ष्य गुवाहाटी था जो कि वहाँ से हाइवे के रास्ते जाने पर लगभग 70 कीलोमीटर था। बबीता जी ने मुझे हाइवे के बजाय हाजो होकर जाने की सलाह दी क्योंकि वहां हयग्रीव माधव का मंदिर था। साथ ही यह मार्ग लगभग दस कीलोमीटर छोटा भी था। मुझे बिना पत्नी के मंदिर जाना बिल्कुल पसंद नहीं क्योंकि विवाह का एक वचन ये भी होता कि मैं तुम्हे साथ लिये बिना कभी भी तीर्थयात्रा नहीं करूंगा। पूरी यात्रा में यहीं एक मंदिर था जहाँ मैंने दर्शन किये। इस मंदिर का निर्माण सोलहवीं शताब्दी में राजा रघुदेव नारायण ने कराया था। यहाँ भगवान विष्णु की पूजा हयग्रीव (जिसकी गर्दन घोड़े की हो) के रूप में की जाती है। इसके पीछे एक कथा आती है कि भगवान ने यह रूप ले कर हयग्रीव नाम के ही एक दैत्य का वध कर वेदों की रक्षा की थी। मंदिर मणिकूट नाम की छोटी सी पहाड़ी पर बना हुआ है। मंदिर बहुत ही कलात्मक है और दीवारों पर बहुत ही सुंदर सुंदर कलाकृतियां बनी हुई है। जब मैं पहुंचा तो वह भगवान के भोग लगाने का समय था इसलिए मुझे प्रतीक्षा करनी पड़ी। भोग के समय के पश्चात पुजारी जी ने मुझे बहुत ही अच्छे से दर्शन करवाए। वहां से प्रसाद पाकर मैं आगे बढ़ा। कुछ आगे जाने पर मुझे ब्रह्मपुत्र के प्रथम दर्शन हुए। ब्रह्मपुत्र के किनारे किनारे ही चलता हुआ मैं गोहाटी के पास पहुंचा। अब मुझे सिर्फ पुल पार करना था और मैं गोहाटी में होता। पहले गोहाटी में जाने के लिए सिर्फ एक पुल था जोकि एक रेल-सह-सड़क पुल है। लेकिन अब इसके ठीक बगल में एक नया पुल बन गया है। पुराने पुल को अब एक लेन के लिए प्रयोग करते हैं और नए पुल को दूसरी लेन के लिए। जब मैं इस पुल पर पहुंचा तब शाम का समय था और सूर्यास्त होने ही वाला था। मैं जिस लेन में था वह पूर्व दिशा में थी इस कारण से सूर्यास्त के फोटो अच्छे नहीं आते। मैंने तेजी से पुल को पार किया, यू टर्न लिया और नए पुल के रास्ते ब्रह्मपुत्र के बीच में आ खड़ा हुआ। मुख्य लेन के किनारे पैदल और साइकिल वालों के लिए एक अलग लेन बनी हुई है जिसे करीब 4 फुट की बाउंड्री से अलग किया गया है। मैं उस बाउंड्री को फांद कर पैदल लेन में पहुंचा। ट्राइपाड लगा कर कैमरे को सेट किया और सूर्यास्त की फोटो लेना शुरू कर दिया। लंबी चौड़ी ब्रह्मपुत्र में सूर्यास्त का दृश्य बहुत ही प्यारा लग रहा था। सूर्यास्त के बाद इधर उधर की कुछ तस्वीरें खींची और एक बार फिर पुल पार करके यू टर्न लिया और फिर पुल को पार किया। अब मैं गुवाहाटी में प्रवेश कर चुका था। क्योंकि शाम का समय था इसलिए ट्रैफ़िक काफी हैवी था। मैं धीमी गति से ही आगे बढ़ता रहा और जल्दी ही शहर के अंदर पहुंच गया। भारालूमुख एरिया में एक होटल लिया। होटल में सामान रखा, मोटरसाइकिल उठाया और ऐसी जगह की तलाश में निकला जहां से गुवाहाटी शहर का रात में फोटो लिया जा सके। गूगल में एक हिल टॉप व्यू प्वाइंट नाम की जगह दिखा रहा था मैं वही पहुंचा। लेकिन वहां से गुवाहाटी शहर का कुछ हिस्सा ही दिखाई दे रहा था। बाकी हिस्सा पेड़ों से ब्लॉक हो गया था। जैसे तैसे मैंने फोटो लिए और वापस नीचे गुवाहाटी शहर में आया। एक मित्र की सलाह पर मैं शुक्रेश्वर महादेव मंदिर पहुंचा ताकि ब्रह्मपुत्र के किनारे रात की फोटोग्राफी कर सकूं लेकिन इस मेहनत का भी कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। उसके पश्चात मैंने गूगल देवता की सहायता से स्थानीय भोजन देने वाले रेस्टोरेंटों की तलाश की और उनमें से एक में भोजन करने पहुंचा। मीनू देख कर मैं तय नहीं कर पा रहा था कि मैं क्या आर्डर करूं।असमिया भोजन की कम से कम आठ-दस तरह की थालियां उपलब्ध थीं। शाकाहारी थाली अलग थी, बंबू थाली अलग थी, चिकन थाली, मटन थाली, डक थाली, पोर्क थाली, मिक्स थाली आदि आदि भी उपलब्ध थीं। मैंने पोर्क थाली का ऑर्डर दिया। चावल के साथ दो या तीन शाकाहारी आइटम थे और कम से कम 8 पोर्क के आइटम थे। मैं आराम से मजे ले लेकर खाता रहा। वहां से खाना खाकर बाहर निकलते ही मेरे साथ एक छोटी सी दुर्घटना घट गई और मुझे ₹3000 का चूना लग गया। हुआ यह की जो पिट्ठू बैग था उसका चेन पूरा खुल गया था और मैंने ध्यान नहीं दिया। जब मैंने मोटरसाइकिल स्टार्ट करके घुमाई तो ट्राइपॉड गिर गया। जब तक मेरा ध्यान जाता और मैं गाड़ी खड़ी करके वापस आकर ट्राइपॉड उठाता, तब तक एक कार वाला ट्राइपॉड को रौंदता हुआ निकल गया। मैंने टूटे ट्राइपॉड को उठाया। उसके तीन टांगों में से दो शहीद हो चुकी थीं। मैंने उसकी तीसरी टांग भी तोड़ कर निकाल दी और अब मैं उसका इस्तेमाल मोनोपॉड के तौर पर करता हूं। बुझे मन से वापस होटल आया और बिस्तर के हवाले हो गया। जय जय
बबीता जी और बबली के साथ
बबीता जी के सौजन्य से.......


हयग्रीव माधव का प्रसाद

ब्रह्मपुत्र के पुल पर


हयग्रीव माधव मंदिर का मुख्यद्वार









ब्रह्मपुत्र के प्रथम दर्शन

पुल से











गोहाटी शहर

नदी के उस पार एक बोट







2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...!!

    लग रहा है कि, मैं ही घूम रहा हूं, भैया ।

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  2. बहुत अच्छा लगा आपसे मिलकर, नमन आपको और आपके यात्रा वर्णन को .....

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