आज मेरी यात्रा का अंतिम दिन था। योजना थी कि सुबह सुबह शिव सागर में रंगघर देख कर चराईदेव के पिरामिड देखे जाएं और वहां से डिब्रूगढ़ चला जाए। इसलिए सुबह सुबह उठकर होटल से चेक आउट करके मैं रंगघर की तरफ बढ़ गया। आगे बढ़ते हुए एक बोर्ड नजर आया "राजभोग होटल" और साथ में नजर आए शीशे मे कैद समोसे, कचौड़ी और जिलेबी। उनको शीशे में कैद देख कर बहुत दुख हुआ। मैं दुकान में पहुंचा कुछ पैसे खर्च किए और यथाशक्ति समोसों कचोरियों और जलेबी को कैद से मुक्ति दिलाई। उसके पश्चात प्रसन्नवदन मैं रंग घर पहुंचा। रंग घर का गेट कोई बहुत विशाल नहीं है लेकिन उसके ऊपर दोनों तरफ दो सुनहरे ड्रैगन बने हुए हैं। भारतीय परंपराओं में कहीं मुझे ड्रैगन देखने को तो नहीं मिले लेकिन शायद चीन की नजदीकी का प्रभाव हो कि वहां ड्रैगन बने हुए थे। अपनी मोटरसाइकिल को किनारे खड़ा कर टिकट खिड़की की तरफ बढ़ गया। भारतियो के लिए टिकट दस रूपए का था जबकि विदेशियों के लिए ढाई सौ का। टिकट लेते हुए बगल में लगे एक शिलापट्ट पर मेरी निगाह पड़ी जिसमें यह बताया गया था कि रंगघर परिसर के पार्क के रिनोवेशन के बाद उसका उद्घाटन वहां के तत्कालिक साज्यसभा सांसद और पूर्व केन्द्रिय वित्त मंत्री सरदार मनमोहन सिंह ने किया था। प्रधानमंत्री इसलिए नहीं क्योंकि उस समय अटल जी प्रधानमंत्री थे। तब कोई सोच भी नही सकता था कि उनके भाग्य में छींका टूटने वाला है और वो अगले प्रधानमंत्री बनने वाले हैं। अंदर घुसते ही एक तरफ पत्थर पर रंगघर का नक्शा बना हुआ था और साथ में उसका इतिहास भी लिखा था। अब मैं क्या इतिहास के चक्कर में पड़ूं आप खुद ही चित्र में पढ़ लीजिए। सामने विशाल घास का मैदान था और बीच में मुख्य भवन तक जाने के लिए रास्ता बना हुआ था। लाल रंग का दो मंजिला मुख्य भवन मैदान के ठीक बीचोबीच खड़ा था। मैं सीधा उसी तरफ लपका। मुख्य भवन अजीबोगरीब तरीके से अष्टकोणिय बना हुआ है और दोनों ही मंजिलों पर बाहर देखने के लिए बड़े-बड़े दरवाजे और झरोखे बने हुए हैं जो कि खेल तमाशा देखने के समय उपयोगी सिद्ध होते होंगे। ऊपर की मंजिल पर जाने के लिए बाई तरफ से सीढ़ियां बनी हुई हैं। ऊपर के सभी झरोखों को सुरक्षा की दृष्टि से जंगले लगाकर बंद कर दिया गया है। भवन की छत उल्टे नाव के आकार की है जिसके ऊपर दो मगरमच्छ दोनों तरफ सिर उठाए तैनात हैं। दोनों के बीच एक तीन गुंबद वाला शिखर है। घूम कर मुख्य भवन के सारे कोने खुदरों का निरीक्षण करने के पश्चात मैंने पार्क पर ध्यान दिया। यह पार्थ कभी मैदान हुआ करता होगा जहां पर अलग-अलग तरह के खेल तमाशे हुआ करते होंगे और राजा, राजपरिवार और उनके दरबारी रंग घर में बैठकर उस का आनंद लेते होंगे। उन खेल तमाशों को प्रदर्शित करने के लिए पार्क में अलग-अलग जगहों पर खेल तमाशे की मूर्तियां लगी है। जैसे कहीं कुश्ती लड़ते पहलवानों की मूर्ति है तो कहीं आपस में लड़ते हुए भैंसों की! अंदर पार्क में ही एक शिलापट्ट लगा दिखा जिसके अनुसार रंग घर का सारा रखरखाव एएसआई के निर्देशन में ओएनजीसी अपने खर्चे पर करती है। रंग घर को जी भर के देखने के बाद मैं चराईदेव के लिए निकला। शिवसागर से चराई देव की दूरी लगभग 30 किलोमीटर है। मैंने गूगल मैप्स को वहां का रास्ता बताने के लिए निर्देशित किया और मोटरसाइकिल पर सवार होकर चल पड़ा। अब तक तो मैं नेशनल हाईवे पर चल रहा था पर अब पहली बार नेशनल हाईवे छोड़कर स्थानीय सड़कों पर चलना शुरू किया और यहीं पर मुझे असली ग्रामीण असम दिखना शुरू हुआ। छोटे-छोटे बांस के घर। दोनों तरफ ढेर सारे सुपारी के पेड़, ढेर सारे तालाब और धान के खेत। इन दृश्यों का का आनंद लेते हुए लगभग 1 घंटे में में चराई देव पहुंचा। यहां के पिरामिड भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्थान हैं। इन्हें पिरामिड तो हम कह रहे हैं स्थानीय तौर पर इनका नाम मैदम है। यह भीड़भाड़ से दूर एक छोटी सी जगह थी। एक कोने में पार्किंग थी और आसपास खाना खाने के लिए दो छोटे-छोटे होटल थे। टिकट की कीमत यहां भारतीयों के लिए ₹25 और विदेशियों के लिए ₹300 थी। एक बात अच्छी लगी कि यहां सार्क देशों के निवासियों के लिए भी टिकट दर भारतीयों के समान ही अर्थात ₹25 ही थी। टिकट काउंटर पर एक उंघता हुआ आदमी बैठा हुआ था जिस से टिकट लेकर मैंने अंदर प्रवेश किया। अंदर घुसते ही बाई तरफ एक बोर्ड पर इस जगह का इतिहास खुदा हुआ था। किन राजाओं ने इसका निर्माण कराया और कौन लोग यहां पर सो रहे हैं उनके बारे में जानकारी थी। सारे पिरामिड हरी भरी घास से हुए है और उनके बीच आवागमन के लिए कंक्रीट की पगडंडियाँ बनी हुई हैं यहां पर जो भी जनता आई हुई थी उनमें से कोई भी पुरातत्व मैं दिलचस्पी रखने वाला नहीं था। लगभग सभी नई उम्र के युवक युवतियां थे जो इस स्थान का उपयोग मिलन स्थल के तौर पर कर रहे थे। पूरा अंदर जाने पर एक पिरामिड खुदा हुआ मिला जिसके अंदर जाने की मनाही थी। राम जाने अंदर से क्या निकला होगा और उसको कहां रखा गया होगा। जहां खुदाई हुई थी वहां दरवाजे के दोनों तरफ 20 20 फीट मोटी दीवारें दिख रही थी और दरवाजे के ऊपर गोल गुंबद दिख रहा था। यदि ठीक से खुदाई हो तो यहां काफी कुछ मिल सकता है। अधिकांश ग्रामीणों के चारों तरफ एक अष्टकोणिय चारदीवारी थी जो कि लगभग दो फुट ऊंची थी। उसका भी रखरखाव ठीक से ना होने से उस पर का मसाला झड़ रहा था और कहीं कहीं तो उसमें पेड़ भी उग आए थे। चूंकि वहां पर देखने को बहुत ज्यादा नहीं था नहीं था और अधिकांश पिरामिड मिट्टी के नीचे दबे हुए थे तो जल्दी ही मैं वहां से निकल लिया क्योंकि अगले दिन सुबह दस बजे डिब्रूगढ़ से मेरी ट्रेन थी और आज रात की डिब्रूगढ़ में ही मेरी मेरे रिटायरिंग रूम में बुकिंग थी। सो आज डिब्रूगढ़ पहुंचना आवश्यक था। फिलहाल मेरे पास अभी बहुत समय था लेकिन रुकने का कोई लाभ नहीं था इसलिए गूगल महाराज को डिब्रूगढ़ का रास्ता बताने के लिए कह कर उनके अनुसार हम चल पड़े। कच्ची पक्की सड़कों से होते हुए छोटे बड़े गांव से और बाजारों से निकलते हुए मैं डिब्रूगढ़ की तरफ बढ़ा। एक जगह तो बांस के पुल से नदी भी पार करनी पड़ी और उसके लिए ₹10 चुकाने पड़े। रास्ते में एक जगह रुक कर एक सज्जन से कच्ची सुपारी भी ली क्योंकि मैंने कभी पेड़ से तोड़ी हुई हरी सुपारी नहीं देखी थी। जिन सज्जन ने मुझे दिया उन्होंने बताया कि कच्ची सुपारी में नशा बहुत ज्यादा होता है इसलिए मैं खाने की जहमत ना उठाऊं। वैसे भी मेरा खाने का सवाल ही पैदा नहीं होता था क्योंकि मैं पान कुछ विशेष मौकों को छोड़ दें तो लगभग नहीं ही खाता हूं। फिर एक जगह बाजार में रुक कर 1 किलो छिलके समेत पक्की सुपारी भी खरीदी। सुपारी को नारियल का मिनी वर्जन समझ लीजिए। जो सुपारी हम पान में खाते हैं या पूजा में उपयोग करते हैं वह अंदर की गिरी होती है। उसके ऊपर नारियल की तरह ही जटाएं होती है जो कि साफ करके बेची जाती है। बीच में एक छोटी सी जगह पर रुक कर मैंने भोजन भी किया। चावल दाल सब्जी और साथ में पोर्क! सच में मजा आ गया। मेरी मोटरसाइकिल का अगला ब्रेक तो पहले से ही खराब चल रहा था। अब पिछला ब्रेक भी बहुत ढीला हो गया था जो कि बहुत धीरे-धीरे लग रहा था। मुख्य सड़क पर आने के बाद मेरे आगे एक व्यक्ति दाहिनी तरफ का इंडिकेटर जलाकर मुड़ने लगा लगा और मेरी ब्रेक नहीं लगी और जाकर मैंने उसको जोरदार टक्कर मारी। फलस्वरूप दोनों ही जमीन पर मोटरसाइकिल समेत फैल गए। आसपास के लोगों ने जल्दी से हमें उठाया। बावजूद इसके कि सारी गलती मेरी थी वह शख्स ज्यादा नाराज नहीं हुआ सिर्फ इतना कहा कि मुझे ब्रेक बनवा कर चलना चाहिए था। मेरे जिरह बख्तर पहनने के कारण मुझे कोई चोट नहीं लगी। वहां से आगे बढ़ने पर जो रिपेयरिंग की पहली दुकान दिखी वहीं पर मैंने ब्रेक टाइट करवा लिए। शाम के लगभग 5:00 बजे तक मैं डिब्रूगढ़ स्टेशन पहुंच गया। जिस मित्र को मोटरसाइकिल देनी थी वह भी 10 से 15 मिनट बाद आ गए और मुझसे मोटरसाइकिल और सारे कागज जांच करने के बाद ले लिए और चले गए। मैं रिटायरिंग रूम में चेक इन करने के लिए इंक्वायरी काउंटर पर पहुंचा। वहां पर जो सज्जन थे वह संयोग से हमारे ही जिले अर्थात देवरिया जिले के निकले। बड़े प्रेम से मिले कागजी खानापूर्ति की और मुझसे कहा कि आपकी बुकिंग रात को 8:00 बजे से है और आजकल हमारे यहां बहुत जांच चल रही है इसलिए मैं आपको अभी रूम में नहीं जाने दे सकता। मैंने भी कहा कि क्यों नियम तोड़ना! बस मेरा सामान अपने पास रख लीजिए और मैं डिब्रूगढ़ सिटी में जाता हूं। वहां खाना भी खा लूंगा और कुछ खरीदारी भी कर लूंगा। आखिर इतनी लंबी सोलो ट्रिप करने के बाद पत्नी के लिए कुछ तो ले जाना बनता था। स्टेशन बिल्कुल शहर से बाहर था और वहां से बाजार लगभग 6 किलोमीटर दूर था। स्टेशन के बाहर शेयर्ड ऑटो चल रहे थे। मैं उससे थाना चरियाली (असम में चरियाली चौराहे को कहते हैं) पहुंचा। वहां पर एक अच्छा सा रेस्टोरेंट देखकर भोजन किया और घर के लिए या दूसरे शब्दों में कहें तो पत्नी के लिए अलग-अलग तरह की तीन चार पैकेट चाय ले ले ली। फिर लगभग चार किलोमीटर पैदल चलकर खुद के लिए पत्नी के लिए और बच्चों के लिए जापी (असम का मशहूर बांस का हैट) खरीदा। वापस स्टेशन आने के लिए शेयर्ड ऑटो नहीं मिले इसलिए एक ऑटो हायर करना पड़ा। वापस स्टेशन आकर अपने रूम में सो गया और अगली सुबह अवध आसाम एक्सप्रेस पकड़कर अपने गांव की तरफ चल पड़ा। तो मित्रों इस चरण के साथ ही मेरा भारत भ्रमण शुरू हो चुका है। जल्दी ही दोबारा आऊंगा और अगले चरण में मेरा लक्ष्य पूरा अरुणाचल प्रदेश घूमने का होगा। तब तक के लिए जै जै!
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| ये असम वाले धान को अजीब तरीके से काटते हैं। पौधे को आधी लंबाई से काट कर उसका गट्ठर बना लेते हैं और उसे बचे ठूंठ पर उल्टा रख देते हैं। |
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| बांस का पुल |
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| सुदूर असम के घोर देहाती क्षेत्र में छठ घाट देख कर बहुत खुशी हुई |
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| पेड़ पर लटकी सुपारी |
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| इन सज्जनों से ही कच्ची सुपारी ली |
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| अपने दरवाजे पर एक क्यूट बच्चा |
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| रंगघर का मुख्यद्वार |
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| रंगघर |
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| मैदम (पिरामिड) का मुख्यद्वार |
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| ढेर सारे छोटे मैदम |
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| खुदा हुआ मैदम |
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| बाहरी दीवार और उसमें उगा पेड़ |





























असोम में बाइकिंग करने में कोई डर तो नहीं है आपका यह लेख पढ़ कर बहुत अच्छा लगा । सारगर्भित व जानकारी पूर्ण
जवाब देंहटाएंअसोम में बाइकिंग करने में कोई डर तो नहीं है आपका यह लेख पढ़ कर बहुत अच्छा लगा । सारगर्भित व जानकारी पूर्ण
जवाब देंहटाएंअसोम में बाइकिंग करने में कोई डर तो नहीं है आपका यह लेख पढ़ कर बहुत अच्छा लगा । सारगर्भित व जानकारी पूर्ण
जवाब देंहटाएंकोई डर नहीं है श्रीमान
हटाएंAap ko bhojpuri jamane ke lekhaka hokhal chahat ba
जवाब देंहटाएंSuperb, Great Writer while being Courageous Traveller.
जवाब देंहटाएंजबरदस्त
जवाब देंहटाएंवाह जी वाह
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया विवरण
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