मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

दस साल बाद कलकत्ता


मेरी बेटी जिसका नाम मैंने दक्षिणेश्वरी रखा था, साल भर की हो गई थी। हमने सोचा कि चलो बेटी को दक्षिणेश्वरी देवी के दर्शन करवा लाते हैं। फिर क्या था. दोनो प्राणियों ने सलाह मशवरा किया और प्रोग्राम बन गया। मेरे कलकत्ता आने की खबर सुनते ही भतीजा धर्मेन्द्र खुश हो गया। मेरी पोस्टिंग उस समय ललितपुर में थी। टिकट करने बैठे तो पता चला कि ललितपुर से कलकत्ते की कोई सीधी ट्रेन नहीं है। कानपुर से जानेवाली सारी ट्रेनें हमेशा की तरह ओवरलोड. अब करें तो क्या करें. फिर बैठा रेलवे के रूटों और टाइम टेबलों का पोस्टमार्टम करने। काफी सिर मारने पर पता चला कि एक कलिंग उत्कल  एक्सप्रेस है जो ललितपुर से खड़गपुर को जोड़ती है। सौभाग्य से उसमें टिकट भी मिल गए। लौटने का कोलकाता भोपाल एक्सप्रेस में बीना तक का टिकट करा लिया। फिर क्या था! श्रीमती जी एक हफ्ते पहले से ही तय्यारियों में जुट गईं। स्त्रियों और पुरुषों ये बहुत बड़ा फर्क है कि मर्द हफ्ते भर की ट्रिप की तय्यारी 15 मिनट में कर लेते हैं और स्त्रियों को दो दिन की ट्रिप की तय्यारी के लिये भी हफ्ते का समय चाहिये होता है। खैर, निकलने का समय आ ही गया और हम सामान ऑटो में डाल कर स्टेशन पहुँचे। पता चला ट्रेन दो घंटे लेट है। देर से ही सही ट्रेन आई और हम रवाना हो गए। रात के ग्यारह बजे हम पहुँचे खडगपुर।  वहाँ से कुल सौ सवा सौ किमी का रास्ता. आँख ठीक से लगी भी नहीं कि पता चला पहुँच गए। और सुबह के साढ़े चार बजे हावड़ा! मेरा चिर परीचित हावड़ा!  बाहर निकलते ही जब हावड़ा ब्रिज के शानदार नजारे ने स्वागत किया तो सफर की सारी थकान छू मंतर हो गई। एक बार फिर काली पीली एम्बेसडर टैक्सी में बैठना पुरानी यादें ताजा कर गया. ये सोच कर कि सुबह सुबह फोन कर के बिचारे की नींद क्या खराब करें, मैं यादों के सहारे रास्ते तय करता मैं धर्मेन्द्र के घर पहुंचने की कोशिश करने लगा। लेकिन जब घर मुश्किल से सौ मीटर दूर था, मेरी याद्दाश्त ने धोखा दे दिया। फोन करके लोकेशन बताने पर भतीजा आ के ले गया।
चूँकि आए थे देवी के दर्शन करने सो सबसे पहले दक्षिणेश्वर जाने का प्रोग्राम बना। पूरी सुबह आराम करने के बाद दोपहर बाद मंदिर के लिये निकले। मिनी बस पकड़ी जो सीधा मंदिर कम्पाउंड में उतारती थी। ये मंदिर मुझे इसलिये विशेष रूप से पसंद है क्योंकि यहाँ दो चीजें बिल्कुल नहीं हैं जो लगभग सभी मंदिरों में होती हैं और सबसे ज्यादा परेशान करती हैं। एक तो गंदगी और दूसरे यजमान फाँसने की कोशिश करते पुजारी। आराम से दुकान से प्रसाद खरीदो, अंदर जाओ, दर्शन-पूजा करो और बाहर आ जाओ। मंदिर बहुत सुंदर बना हुवा है। देवी के दर्शन के बाद हम परिसर में ही घूमने लगे। मुख्य मंदिर के सामने हुगली की धारा के समानांतर भगवान शिव के 12 मंदिर बने हुवे हैं। इन मंदिरों के बीच से नदी तक पहुँचने का रास्ता बना हुआ है। हम नहाने की योजना बना कर तो आए नहीं थे सो सबके उपर थोड़ा थोड़ा पानी छिड़क के औपचारिकता पूरी कर ली।

फिर मंदिर से बाहर निकले। सामने खाने पीने के स्टालों का मेला लगा हुवा था।  हर तरह का शाकाहारी फास्ट फूड उपलब्ध था। हमने बंगाली झाल मुढ़ी का आनंद लिया। फिर वहाँ से बेलुर मठ जाने के लिये नाव पकड़ी। कलकत्ते में नाव का अच्छी सुविधा है। और किराया? मात्र 8 रूपए प्रति व्यक्ति! नाव पर चढ कर श्रीमती जी की खुशी का तो कोई हिसाब ही नहीं था। और तो और मेरी नन्ही मुन्हीं बेटी भी किलकारियाँ मार उठी।

शाम के करीब चार बजे हम स्वामी राम कृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद की साधना स्थली बेलुर मठ पहुँचे। यहाँ के शांत सुरम्य वातावरण ने मन मोह लिया। चारो चरफ गेरुए वस्त्रों में लिपटे सन्यासी नजर आ रहे थे। एक तरफ माँ शारदा देवी का मंदिर था। उसमें माँ का सारा श्रृंगार, परदे, यहाँ तक कि चरण पादुकाएं भी ताजे चमेली की कलियों से बनी हुईं था जिसकी भीनी खुशबू हवा में तैर रही थी।

वहाँ से आगे बढने पर स्वामी विवेकानंद का निवास स्थान था जहाँ उनकी यादों को उत्तम तरीके से संजोया गया है। उनकी राइटिंग टेबल, बिस्तर, छड़ी, पादुकाएं, तस्वीरें ईत्यादि करीने से रखी हुईं थीं। दीवारों पर उनके चित्र लगे हुए थे। वहीं थोड़ी दूरी पर वह स्थान है जहाँ श्रीफल के पेड़ के नीचे ध्यान लगा कर स्वामी जी ने प्राण त्यागे थे। कुछ वर्ष पहले पुराना पेड़ गिर गया अतः वहाँ  श्रीफल का ही नया वृक्ष लगा दिया गया है।

फिर वहाँ से निकल कर हम बाग में आए जहाँ तरह तरह के फूल खिले हुए थे। लग रहा था जैसे वहाँ जनवरी में भी बसंत चल रहा था। वहीं बगल में मठ का साहित्य केन्द्र था जहाँ विवेकानंद और स्वामी रामकृष्ण से संबंधित साहित्य बिक्री के लिये उपलब्ध था।

उसके बाद हम मुख्य भवन में पहुँचे जहाँ स्वामी रामकृष्ण का निवास था। ऊँची ऊँची दीवारों से घिरे हॉल के एक सिरे पर माँ काली की मूर्ति खड़ी अवस्था में और स्वामी रामकृष्ण की मूर्ति जमीन पर बैठी अवस्था में थी।  आरती का समय होने वाला था, सो हम आरती के लिये रुक गए। नियत समय पर आरती शुरू हुई। पूरा परिसर घंटे-घड़ियाल और आरती के स्वरों से गूँज उठा। आरती समाप्त होने पर हम वापसी के लिये मठ से निकले। घाट पर छोटी सी चाय की दुकान थी। कलकत्ता में चाय अधिकतर जगहों पर कुल्हड़ में मिलती है। हमने भी एक एक कुल्हड़ चाय ली और तट पर बैठ गए। पुत्री ने वहाँ वो ऊधम मचाया कि पूछो मत!

फिर वापसी की नाव पकड़ी, फिर बस से वापस घर!

-----------------------------------------जारी रहेगा---------------------------------------------------------
वह श्रीफल का पेंड़ जहाँ स्वामी जी ने प्राण त्यागे थे
गंगा की धारा से दक्षिणेश्वर मंदिर

माँ शारदा का मंदिर

वापस लौटते समय नाव में

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