बुधवार, 19 दिसंबर 2018

दो पहियों पर पूर्वोत्तर : दूसरा पड़ाव : सिलीगुड़ी

24 नवंबर शनिवार
दरभंगा

सुबह सुबह छह बजे नींद खुल गई। लेकिन इतनी सुबह मेरा निकलने का कोई इरादा नहीं था। मोटरसाइकिल की नंबर प्लेट पर आधे नंबर थे और आधे नहीं थे। मैं दरभंगा में कम से कम अपनी नंबर प्लेट तो ठीक करा ही लेना चाहता था। इसलिए सुबह सुबह निकल कर बाहर टहलने लगा। सामने ही घंटाघर था और अधिकांश शहरों की तरह घंटाघर की घड़ी खराब थी। बगल में ही दातुन बिक रहे थे और नीम का दातुन तो मेरा फेवरेट है। ₹1 का एक दातुन लिया और दांत रगड़ते हुए शहर में टहलने लगा। सुबह सुबह सड़कों पर या तो खिलाड़ी दिखते हैं या छात्र। लगभग सारी दुकानें बंद थीं। आराम से टहलता हुआ हुआ दातुन करता रहा। कुछ देर टहलने के बाद छोले भटूरे की दुकान दिखी। मैं ठहरा चटोरा आदमी। तुरंत वहां पर दातुन खत्म किया, कुल्ला किया और भटूरे का आर्डर फारमा दिया। मैंने छोले भटूरे बहुत जगह खाए हैं लेकिन सड़क के किनारे कड़ाही से निकलते गरमा गरम छोले भटूरे खाने का आनंद ही कुछ और है। दनादन 4 छोले भटूरे दबा दिए। उसके बाद एक प्लेट चावल भी मार दिया। फिर भी शरीर भारी नहीं लग रहा था। आराम से होटल में आया, थोड़ी देर विश्राम किया और वहां से चेक-आउट कर लिया। मैं अगल-बगल की दुकानें देखता हुआ मंथर गति से मैं आगे बढ़ रहा था। थोड़ी देर बाद मुझे नंबर प्लेट बनाने की दुकानें दिखने लगीं लेकिन सारी बंद थीं। थोड़ा आगे जाने पर एक सज्जन दुकान खोलते हुए नजर आए। मैंने वहां जाकर अपनी मोटरसाइकिल खड़ी कर दी और भाव ताव करना शुरू कर दिया। मूल्य पर सहमति होने के बाद उन्होंने अपना काम शुरू कर दिया। बातों ही बातों में जब उनको पता चला कि मैं देवरिया से आ रहा हूँ और लक्ष्य डिब्रूगढ़ है तो बड़े प्रसन्न हुए और चाय पानी के लिए पूछने लगे। दुकान के पिछले हिस्से में ही उनका घर भी था। मेरे यह कहने पर कि मैं चाय नहीं पीता उन्होंने घर से नाश्ता मंगवा दिया। नाश्ते में कच्चे कटे हुए पपीते और अंकुरित मूंग थी। हलांकि स्वास्थ्य की दृष्टि से यह बहुत ही उत्तम नाश्ता है लेकिन यह दोनों ही चीजें मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। फिर भी कोई इतने प्रेम से और इतना मनुहार करके खिलाए तो कोई ना कैसे कर सकता है। मुझे पपीते और मूंग भी बहुत स्वादिष्ट लगे। मोटरसाइकिल के वाइजर पर काफी स्क्रैच थे इसलिए मैंने सोचा कि इस पर कुछ लिखवा लेने पर सारे स्क्रैच उसके पीछे छुप जाएंगे। इसलिए मैंने उस पर चरैवेति चरैवेति लिखवाने का फैसला किया। उस सज्जन ने बिना कुछ अतिरिक्त पैसे लिए यह काम कर दिया। ज्यादा बातचीत करने पर पता चला कि उनका नाम सुशील मेहता है और उनके पूर्वज विभाजन के समय पाकिस्तान से यहां आए थे। विभाजन के समय पाकिस्तान से आए लोगों की एक खास बात देखता हूँ कि सभी लोग धंधा करने वाले ही होते हैं। बहुत कम लोग नौकरी पेशा मिलते हैं। और धंधे मे ये लोग बहुत सफल होते हैं। मुझे लगता है कि उस जमाने में लाहौर हिंदू व्यापारियों का गढ़ था और विभाजन के कारण उनको जल्दबाजी में सब छोड़ कर आना पड़ा। उनसे विदा लेकर मैं आगे बढ़ा और ललित नारायण विश्वविद्यालय दरभंगा जहां से मेरी माता जी ने पढ़ाई की है, को पार करते हुए आगे बढ़ा। रेलवे क्रॉसिंग बंद होने के कारण मुझे रुकना पड़ा। सामने बिहार संपर्क क्रांति की शंटिंग हो रही थी। काफी देर तक पकाने के बाद फाटक खुला। एक रेलवे लाइन पार करके दूसरी लाइन के किनारे किनारे आगे जाने पर मैं एक बार फिर नेशनल हाईवे 27 पर पहुंच गया। दरभंगा से फारबिसगंज 162 किलोमीटर दूर है। मैंने अंदाजा लगाया कि दो-तीन घंटे में पहुंच जाऊंगा और वहां पर गाड़ी का इंश्योरेंस तो कम से कम करवा ही लूंगा। और अपरिचित जगह पर मैं इंश्योरेंस एजेंट कहां ढूंढता, इसलिए मैंने फैसला किया कि मैं सीधा आई सी आई सी आई बैंक में चला जाऊंगा। थोड़ा आगे जाने पर  कोसी नदी के दर्शन हुए। वह नदी जिस को बिहार का शोक कहा जाता है। हर साल भयंकर तबाही मचाती है। बहुत लोगों को बर्बाद करती है तो बहुतों को मालामाल भी कर जाती है। शायद इसीलिए सरकारी विभाग इसकी कोई  परमानेंट व्यवस्था नहीं करते। लेकिन यही कोसी वर्षा के मौसम के बाद जब जमीन छोड़ती है तो वह जमीन जबरदस्त उपजाऊ होती है। बिना किसी सिंचाई या खाद के उस में जबरदस्त फसल होती है। हर साल बाढ़ के बाद यह नदी अपना रास्ता बदल लेती है। अब तो यहां के निवासी भी के कोसी साथ जीना सीख गए है। उसके बाद एक मजेदार घटना हुई। मैंने देखा सड़क के किनारे किसानों ने पटसन सूखने के लिए फैला रखा था। एक जगह ट्रक खड़ा करने के लिए अतिरिक्त चौड़ी सड़क बनाई गई थी और उस पूरी सड़क पर किसानों ने पटसन सूखने के लिए फैला रखा था। एक किसान वहां पर काम कर रहा था। काम क्या कर रहा था बस सब उलट-पुलट रहा था कि ठीक से सूख जाए। मैं रुका और उस दृश्य की फोटो लेने की कोशिश की लेकिन किसान ने समझा कि मैं कोई सरकारी अधिकारी हूँ। उसके सड़क पर जूट फैलाने की वजह से नाराज हूँ इसलिए तस्वीर खींचकर उसके ऊपर कारवाई करने के लिए भेजने वाला हूँ। उसने माफी मांगना शुरू कर दिया। पहले तो उसने कहा कि जूट उसका नहीं है किसी और का है। उसके बाद कहने लगा दोबारा वह जूट सड़क पर नहीं फैलाएगा। उसके बाद हाथ जोड़ने लगा, पैर पड़ने लगा। उसके बाद जूट से भरी हुई एक बैलगाड़ी आई तो उसने बैलगाड़ी को डर के मारे दूर से ही वापस भेज दिया। फिर कुछ स्थानिय लौंडे वहां से गुजर रहे थे। मैंने उनको पकड़ा तो वह किसान को समझा सके कि मैं सरकारी कर्मचारी नहीं हूँ और फोटो सिर्फ मनोरंजन के लिए खींच रहा हूँ। तब जाकर वह किसान फोटो खिंचाने को तैयार हुआ। करीब साढ़े ग्यारह बजे मैं फारबिसगंज पहुंचा। वहां जाकर पता चला कि इस कस्बे में आईसीआईसीआई या एचडीएफसी बैंक की कोई ब्रांच नहीं है। मेरा तो मूड ही खराब हो गया और मैंने हाईवे से उतरने की भी जहमत नहीं उठाई और सीधा आगे बढ़ गया। फारबिसगंज से लगभग 30 किलोमीटर दूर अररिया है जोकि जिला मुख्यालय है। इसलिए वहां पर तो बैंक जरूर था। लेकिन पहुंचने पर उसका दरवाजा बंद मिला। कारण कार्तिक पूर्णिमा की छुट्टी। मैंने अपना सर पीट लिया क्योंकि आज शनिवार था और कल रविवार की छुट्टी रहेगी। अब परसों ही कुछ हो पाएगा, और बीच में अगर किसी पुलिस वाले ने थाम लिया तो कल्याण ही हो जाएगा। जब मैं परेशान होता हूं तुम्हें एक ही काम करता हूं और वह है बढ़िया खाना। सड़क पर एक विजय होटल लिखी दुकान देखी और उसमें घुस गया और सीधा हाफ प्लेट मटन का ऑर्डर दे दिया। उसने पूछा कौन सा पीस दूं तो मेरे मुंह से अनायास निकल गया कि चुस्ता दे दो। और भाग्य कि उसके पास चुस्ता था भी। फिर बड़ा दिल लगाकर मैंने खाना खाया। खाने के बाद मूड बिल्कुल फिट हो गया था। किंतु जब मैं बिल पे कर रहा था तब मैं थोड़ा निराश हो गया क्योंकि उसके पास कम से कम 10 तरह की मछलियां थीं। देसी मांगुर, सिंही, रोहू, कतला इत्यादि। अगर मुझे पहले पता होता तो मैं मटन के बजाय मछली को ही वरीयता देता। खैर खाना फिर कभी। मैं मोटरसाइकिल पर बैठ ही रहा था कि सड़क के दूसरी तरफ सहज सेवा केंद्र लिखा बोर्ड दिखाई दिया। मैं मोटरसाइकिल से उतरा और दुकान में घुसा और उससे इंश्योरेंस के बारे में पता किया। उसने लैपटॉप खोला और आधे घंटे में इंश्योरेंस मेरे हाथ में था। मुझे बहुत राहत मिली। मोटरसाइकिल पर बैठा और गूगल देवता को सिलीगुड़ी का रास्ता बताने का निर्देश देकर गाड़ी आगे बढ़ाई। यह राहत क्षणिक थी। क्योंकि तीन-चार किलोमीटर आगे जाते ही गूगल देवता मुझसे फोरलेन हाईवे छोड़ कर दो लेन की सड़क पर मुड़ने को कहने लगे। मैंने रुक कर जांच पड़ताल की तो पता चला यदि मैं चार लेन सड़क यानी नेशनल हाईवे नंबर 27 पकड़ता हूं तो मुझे करीब 50 किलोमीटर ज्यादा चलना पड़ेगा और मजा भी नहीं आएगा। और अगर मैं यह छोटा रास्ता पकड़ता हूँ तो तकलीफ तो होगी लेकिन रास्ते का आनंद भी आएगा। मैंने गूगल देवता का निर्देश मानते हुए छोटे रास्ते पर ही आगे बढ़ने का फैसला किया। पहले यह सड़क स्टेट हाईवे नंबर 63 हुआ करती थी। लेकिन अब इसको केंद्र सरकार ने अपने पास ले लिया है और उसको नया नंबर दिया है। नेशनल हाईवे 327। अब चूंकि यह सड़क नेशनल हाईवे बन गई है इसलिए इस पर जोर शोर से काम चल रहा है। इस कारण से मुझे चलने में तो परेशानी हुई लेकिन छोटे-छोटे कस्बों के बीच से नदी नाले पार करते हुए निकलने में आनंद आ गया। छोटे-छोटे ग्रामीण बाजार, खेतों में काम करते हुए लोग, स्कूल से लौटते हुए बच्चे और सबसे मजेदार छोटे-छोटे गड्ढों में मछली पकड़ते हुए बच्चे। बहादुरगंज-ठाकुरगंज  होते हुए  गलगलिया जोकि बंगाल बंगाल और बिहार का बॉर्डर है, पहुंचते पहुंचते अंधेरा होने लगा। अंधेरा होने पर मैं रुका, अपनी जैकेट पहनी, हेलमेट का शीशा ऊपर किया और प्लेन चश्मा लगा लिया। लेकिन मैंने पिछले दिन चश्मे को पाना के साथ रख दिया था इसलिए चश्मे की एक आंख पर स्क्रैच आ गए थे और इस वजह से मुझे स्पष्ट नहीं दिख रहा था। एक तो रात का समय ऊपर से दो लेन की सड़क। जब सामने से कोई वाहन आता तो उसकी लाइटों की चकाचौंध मुझे लगभग अंधी कर देती इसलिए मैं आराम से लगभग 40 की स्पीड से चल रहा था। फिर थोड़ी देर में अचानक मेरे ज्ञान चक्षु खुले और समझ में आया कि जब 40 की स्पीड से ही चलना है तो चश्मे की क्या आवश्यकता है। मैंने चश्मा उतार कर जेब में रखा और आराम से आगे बढ़ा। बंगाल में जहां जहां नेशनल हाईवे खराब था वहां पर राज्य सरकार ने बोर्ड लगा दिया था “दिस रोड इस प्रॉपर्टी ऑफ नेशनल हाईवे” ताकि यात्री समझ जाए कि उसको जो तकलीफ हो रही है वह राज्य सरकार नहीं बल्कि केंद्र सरकार दे रही है। खैर एक दो शॉर्टकट और लिए और साढ़े छह बजे तक बागडोगरा पहुंच गया। कभी बागडोगरा सिक्किम पहुंचने के लिए नजदीकी एयरपोर्ट हुआ करता था। लेकिन अब सिक्किम के पास अपना एयरपोर्ट है। सिलीगुड़ी से पहले  सड़क बाला सोन नदी को क्रॉस करती है। मैं नदी के पहले एक फास्ट फूड वाले की दुकान पर रुका। नियत शरीर को थोड़ा आराम देने की और लगे हाथों कुछ नाश्ता करने की थी। दुकान में उपलब्ध विकल्पों में मुझे फ्राइड चिकन लेग ही सबसे बढ़िया विकल्प लगा और जब दुकान वाले ने वह मुझे दिया तो मैं मुर्गे की टांग का साइज देखकर चौक गया। कम से कम अपनी तरफ या दिल्ली में मैंने कभी किसी रेस्टोरेंट में इतना बड़ा लेग पीस नहीं खाया। मैंने बड़ी तसल्ली से बैठकर उसको निबटाया और हाथ पैर सीधा करके आगे बढ़ा। मुझे पता भी नहीं चला कि मैं कब बागडोगरा से सिलीगुड़ी में प्रवेश कर गया। शहर के अंदर जबरदस्त ट्रैफिक था। मैं चलता रहा और जल्दी ही सिलीगुड़ी स्टेशन के पास पहुंच गया। वहां पर एक होटल में कमरा लिया, सामान रखा, और हाथ मुंह धोकर टहलते हुए बाहर निकला। आज लगभग 370 किलोमीटर गाड़ी चला चुका था और पीठ में भयंकर दर्द हो रहा था। ऐसे ही टहलते हुए एक नाई की दुकान नजर आई और मैं जाकर उसमें दाढ़ी बनवाने बैठ गया। नाई ने बड़े प्रेम से दाढ़ी बनाया। फिर फेशियल के लिए पूछा। मैंने कहा भाई फेशियल तो मैं नहीं कराता अगर तुझे तेल लगाकर मालिश करने आती है तो वह कर दे और नाई मेरे पर भिड़ गया। पंद्रह मिनट के बाद जब मैं वहां से अपनी मरम्मत करवाकर निकला तो मिजाज काफी फ्रेश हो चुका था। मुझे अपने लिए कुछ कपड़ों की जरूरत थी इसलिए पूछते पूछते वहां के कपड़ों के बाजार में पहुंचा। मुझे कपड़े खरीदने का कोई खास एक्सपीरियंस नहीं है इसलिए समझ में नहीं आ रहा था मैं कहां से खरीदूं और क्या खरीदूं। फिर भी चूंकि खरीदना आवश्यक था इसलिए सस्ता महंगा जैसा भी हुआ एक जोड़ी गर्म कपड़ा खरीद लिया। खाने के लिए एक बंगाली होटल दिखा तो मैं उसमें घुस गया। उसके पास बरारी मछली थी लेकिन रोटी नहीं थी। मैंने चावल से ही काम चला लिया क्योंकि मछली बहुत बढ़िया थी। फिर वापस होटल में आया और थकान के मारे कब नींद आ गई पता भी नहीं चला।

जै जै

कैप्शन की जरूरत है क्या




प्यार से परोसा गया नाश्ता


चुस्ता रोटी





चरैवेति चरैवेति

कोसी का प्रवाह


कोसी के तटबंध पर बसावट
सड़क पर सूखता पटसन (जूट)
जूट से लदी गाड़ी




अब रास्ते के दृष्य....
रास्ते में कहीं
खइनी नहीं छूटनी चाहिए.......







कोसी पुल पर

बरारी - भात इन सिलीगुड़ी




2 टिप्‍पणियां:

  1. नया रास्ता बहुत दूरी कम कर देगा... लेकिन जो मजा 4-लेन में है, वो 2-लेन में नहीं...

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    1. चार लेन तब अच्छा है जब आपको दाएं बाएं देखे बिना उड़ते हुए निकल जाना हो या सूर्यास्त के बाद गाड़ी चलानी हो। आनंद लेने के लिए दो लेन ही अच्छी है.............

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