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बुधवार, 2 जनवरी 2019

दो पहियों पर पूर्वोत्तर : चौथा पड़ाव : नलबाड़ी

26 नवंबर 2018 सोमवार
सिंगथाम एनएचपीसी

आज के लिए मैंने कोई लक्ष्य नहीं रखा था। चूंकि मैं वास्तविक योजना से काफी पीछे चल रहा था इसलिए आज मैंने अधिक से अधिक दूरी तय करने का मन बनाया था। सुशांत तो सुबह जल्दी उठ कर ऑफिस निकल गया और मुझसे मिलते हुए जाने को कहता गया। मुझे इससे कोई समस्या नहीं थी क्योंकि उसका ऑफिस रास्ते में ही था। भाभी जी ने गर्मागर्म आमलेट का नाश्ता कराया। फिर उनसे विदा ले कर मैं वहां से निकला। थोड़ी देर में मैं सुशांत के आफिस में पहुंचा जहां मुझे पता चला की साहब जीरो साइट पर हैं। सड़कों पर साइटों के नाम किलोमीटर पर आधारित होते हैं। किसी साइट का नाम इस बात को दर्शाता है कि वह बेस प्वाइंट से कितनी दूर है। इसलिए जीरो साईट यानी वह जगह जहां से सड़क  का यह सेक्शन शुरू होता है जो कि सिंगथाम में था। मैं वहां पहुंचा तो सुशांत यूनीफार्म चढ़ाए, मुंह पर डस्ट मास्क चढ़ाए अपने काम में लगा हुआ था। उससे मिल कर मैंने विदा ली और वापस निकल लिया। कल जिस रास्ते से मैं यहां आया था आज उसी रास्ते से वापस जा रहा था और ऐसा करना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है। लेकिन इसके सिवा कोई दूसरा चारा भी नहीं था क्योंकि दूसरा रास्ता बहुत मुश्किल और बहुत लंबा था और मैं ऑलरेडी अपनी योजना से पीछे चल रहा था। सिंगथाम से रांगपो को पहुंचा फिर वहां से वापस चलता हुआ आगे बढ़ा। उतरने में एक्सीलरेटर की जरूरत कम और क्लच ब्रेक की जरूरत ज्यादा पड़ रही थी। 10-12 किलोमीटर आने के बाद मेरी गाड़ी ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। स्टार्ट करने पर स्टार्ट तो हो जाए लेकिन  क्लच छोड़ते ही बंद हो जाए। फिर मैंने  धक्का देकर आगे बढ़ाने की कोशिश की तो भी गाड़ी ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। तब मुझे पता चला कि अगले पहिये में मौजूद डिस्क ब्रेक जाम हो गया है। सामने ही एक छोटा सा रेस्टोरेंट था। मैं उस में जाकर बैठ गया और विचार करने लगा कि क्या किया जाए। सबसे पहले अपने मित्र मकैनिक चुलबुल को फोन लगाया लेकिन उसका फोन लग ही नहीं रहा था। सही बात है बुरे समय में तो साया भी साथ छोड़ देता है। उसके बाद मैंने अपने एक दूसरे मित्र पवन को जिसकी दुकान चुलबुल की दुकान के पास में ही है, को फोन लगाया और उससे चुलबुल से बात कराने को कहा तो पता चला कि चुलबुल बाबू कहीं गए हुए हैं। मैंने कहा, भाई उसकी दुकान के किसी भी मैकेनिक से बात करा दो। तो मेरी बात उसके छोटे भाई राम ज्ञान से हुई। उसने मुझे बताया की 11 नंबर पाना से एक छोटे से नट, जिसके ऊपर एक छोटा सा नोजल बना हुआ होगा और वह रबर की कैप से ढका हुआ होगा को ढीला करने से ब्रेक ढीला हो जाएगा। मुझे वह नट तो आराम से मिल गया लेकिन वहां बीच रास्ते में 11 नंबर पाना कहां से लाता। जब कुछ नहीं सूझा तो सामने के होटल में बैठकर दो अंडों के साथ एक प्लेट मैगी का ऑर्डर दे दिया और बैठकर सोचने लगा। मैं जब भी परेशान होता हूं तो सारी झल्लाहट, सारा गुस्सा, सारी परेशानी खाने पर निकालता हूं। घर पर भी अगर मैं अपने नियमित भोजन से ज्यादा खाने लगता हूं तो मेरी पत्नी समझ जाती है कि आज मैं परेशान हूं। मेरे खाने के दौरान ही एक पिक-अप वाला आया और वह भी खाना मंगा कर कर खाने लगा। मैंने अपनी मैगी खत्म की और उससे पूछा क्या उसके पास 11 नंबर पाना है तो उसका जवाब सकारात्मक निकला और बोला खाना खा कर देता हूं। मैं प्रतीक्षा करने लगा लेकिन बीच में ही उसने अपने क्लीनर को आवाज लगाई और पाना देने को कहा। क्लीनर से पाना लेकर मैं वह नट खोलने की कोशिश करने लगा। लेकिन जब किस्मत ही खराब हो तो इंसान हाथी पर भी बैठा हो तो कुत्ता काट लेता है। वह नट काफी पुराना लगा हुआ था और इसलिए बहुत जाम था। अंत में कट पाना उसके ऊपर फिसल गया। मैं तो बुरी तरह से इरिटेट हो गया। बड़ी मुश्किल से तो कटपाना मिला था लेकिन वह फिसल गया। अब मैं यहां रिंग पाना कहां खोजूं। उस नट के पीछे भी एक नट लगा हुआ था जिस को ढीला करने पर हाइड्रॉलिक ऑयल निकल सकता था और शायद उससे ब्रेक ढीला हो जाता। लेकिन उसके लिए  15 नंबर पाना चाहिए था जो कि पिक अप वाले के पास नहीं था। मैंने चाकू निकाला और ब्रेक का हाइड्रोलिक पाइप काट देने का फैसला किया। लेकिन शायद भाग्य इतना ज्यादा भी मेरे विरुद्ध नहीं था। एक ट्रक वाला भी उसी होटल में खाना खा रहा था। पिक अप के ड्राइवर ने उससे 15 नंबर पाना का जुगाड़ कर दिया और लेकर मेरे पास आया। लेकिन तब तक मैं आधा हाइड्रोलिक पाइप काट चुका था भाग्य ठीक था कि अब तक चाकू पाइप के बीच तक नहीं पहुंचा था इसलिए कोई लीकेज नहीं हुई थी। हमने नट ढीला किया और नट ढीला होते ही ब्रेक छूट गया। मैंने उन दोनों ड्राइवरों को धन्यवाद दिया, खाने का भुगतान किया और गाड़ी स्टार्ट कर के आगे बढ़ गया। आगे बढ़ते हुए मैंने तीस्ता ब्रिज पार किया, फिर मैंने तीस्ता पर बने बांध को पार किया और करीब 1 घंटे बाद मैं उस जगह पर पहुंच गया जहां से से मुझे सिलीगुड़ी का रास्ता छोड़कर पुल पार कर लेना था। तीस्ता नदी पर बने पुल का नाम कोरोनेशन ब्रिज है। कोरोनेशन का मतलब होता है राज्याभिषेक। 1937 में जब किंग जॉर्ज सिक्स्थ का राज्याभिषेक हुआ तो उसकी याद में इस पुल का निर्माण शुरू कराया गया था जो कि 1941 में बनकर पूरा हुआ और आम जनता के लिए खोल दिया गया। स्थानीय लोग इसे बाघपुल नाम से पुकारते हैं। यहां से नेशनल हाईवे नंबर 17 शुरू हो जाता है और वह रेलवे लाइन के साथ साथ चलता रहता है। जल्दी ही ऊंची पहाड़ियों से निकल कर सड़क थोड़े खुले इलाके में आ गई। इसके बाद मैंने गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी क्योंकि सड़क के दोनों तरफ चाय बागान थे इसलिए  किनारों से किसी जानवर या इंसान के आने का खतरा नहीं था। चलता हुआ मैं उदलाबाड़ी में एक मैकेनिक के यहां रुका और अगला ब्रेक देखने को कहा। उसने देखते ही कह दिया कि आपके रबर पैड्स घिस चुके हैं और पूरी नई किट लगानी पड़ेगी और नई किट आपको एजेंसी में ही मिलेगी जो कि आगे माल बाजार में है। ब्रेक को मैंने पूरा ढीला कर दिया था लेकिन अब तक वह फिर से आधा टाइट हो चुका था। माल बाजार वहां से थोड़ी ही दूर है। मैं वहां ढूंढते हुए  होंडा के सर्विस सेंटर पहुंचा लेकिन उनके कर्मचारियों ने मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। उन्होंने मेरे रिक्वेस्ट करने पर भी 2 घंटे से पहले गाड़ी को हाथ लगाने से मना कर दिया। मैं झल्ला कर वहां से वापस निकला और एक मैकेनिक यहां रुका। उसने ब्रेक को फिर से ढीला कर दिया और मुझे 11 नबर का रिंग पाना खरीद कर दे दिया कि रास्ते में अगर फिर से ब्रेक जाम हो जाए तो परेशानी ना हो। अगला ब्रेक लगना लगभग बंद हो गया और मैंने इसको गंभीरता पूर्वक नहीं लिया जिससे कि आगे मैं मुसीबत में भी फंस गया। आगे की बात बाद में करेंगे। फिलहाल मैं माल बाजार से आगे बढ़ा। माल बाजार से आगे जलढाका नदी पार की और चलते हुए मध्यमदारी हाट पहुंचा और वहाँ छोटे से रेस्टोरेंट में रुककर लंच किया। लंच में चावल दाल और साग के साथ पता नहीं कौन सी मछली थी। साथ में आमलेट भी ले लिया। लेकिन सबसे ज्यादा मजा साग में ही आया। वहां से निबट कर एक बार फिर चाय के बागानों के बीच से उड़ता हुआ में आगे बढ़ा। आगे तोर्षा नदी पार करके अलीपुरद्वार को बाईपास करता हुआ मैं आगे बढ़ा। अलीपुरद्वार को पार करते ही नेशनल हाईवे 317 खत्म हो जाता है और एक बार फिर नेशनल हाईवे 27 चालू हो जाता है। नेशनल हाईवे 27को  मैंने सिलीगुड़ी में छोड़ा था और अलीपुरद्वार मैं मैं वापस इसी पर आ गया। अब तक की यात्रा का लगभग 80% हिस्सा मैंने नेशनल हाईवे 27 पर तय किया था। चाकचोका से कुछ आगे गदाधर नदी पार करते ही हम बंगाल से असम में प्रवेश कर जाते हैं। मैं बिना रुके चलता रहा और लगभग 6:00 बजे बंगाईगांव पहुंच गया। बबीता कोमल जी नलबाड़ी में रहती हैं और मुझे उनसे मिलना था। उनका उपन्यास मैं हूं बबली - एक लड़की प्रकाशित हो चुका है और इस सीरीज के दो उपन्यास और आने वाले हैं। इसकी कहानी का अधिकांश हिस्सा बंगाई गांव में ही चलता है इसलिए मुझे यह जगह परिचित सी लगी। मैं काफी थक चुका था। लेकिन नलबाड़ी यहां से 120 किलोमीटर ही दूर था तो मैंने तय किया कि आज नलबाड़ी ही चलते हैं। 4-लेन की सड़क है। 120 किलोमीटर की दूरी हद से हद तीन घंटे में पूरी हो जाएगी।

लेकिन एक बार फिर यही कहूंगा कि सोचा हुआ कहां हो पाता है। चार लेन की सड़क में दो लेन बंद थी। और बची हुई दो लेनो में ट्रकों की लाइनें लगी थी। और कोढ़ में खाज का काम किया बरपेटा रोड में हो रही रास पूजा ने। नलबाड़ी पहुंचते पहुंचते रात के ग्यारह बज चुके थे। वहां भी रास पूजा हो रही थी और सारा शहर जगा हुआ था। फिर भी रात के ग्यारह बजे किसी का दरवाजा खटखटाना, वह भी ऐसे व्यक्ति का जिससे आप पहले कभी नहीं मिले हों घनघोर असभ्यता कहलाएगी। इसलिए मैंने होटल खोजना शुरू किया। एक छोटा सा जिला मुख्यालय जहां पर गिनती के होटल हों, में आधी रात के लगभग होटल खोजना भी कष्ट साध्य काम था। लेकिन पूजा के वजह से  लोग जगे हुए थे। पूछताछ करने पर  मुझे होटल प्रेमोदय का रास्ता समझा दिया गया। होटल पहुंचने पर पता चला कि पूजा के कारण होटल पूरा भरा हुआ है। इस बार मैंने गूगल देवता का आह्वान किया और उन्होंने बताया शहर से बाहर हाईवे पर एक होटल बोरदोईशिला है। मैं वहां पहुंचा लेकिन वहां पर भी यही हालत। मुझे लगा कि आज तो मुझे अपना टेंट और स्लीपिंग बैग निकालना ही पड़ेगा। लेकिन मैंने एक आखरी बार गूगल देवता की मदद ली और उन्होंने मुझे एक छोटे से होटल के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। वहां पर मुझे ₹400 में एक घटिया सा कमरा मिला। खैर, कमरा मिल गया यही बड़ी बात थी। खाना तो मैंने रास्ते में ही रुक कर खा लिया था क्योंकि मुझे अंदाजा था कि देर होने के कारण नलबाड़ी में खाना नहीं मिलेगा। चूंकि पूरा दिन भागते हुए बीता था इसलिए आज के फोटो गिनती के ही हैं।

जै जै
सुशांत के साथ

लंच


सोमवार, 17 दिसंबर 2018

दो पहियों पर पूर्वोत्तर : पहला पड़ाव : दरभंगा


23 नवंबर 2018, शुक्रवार


पिछले तीन महीने से सिर्फ योजना ही बन रही थी और योजना के हिसाब से आज मुझे नेशनल हाईवे पर होना था और अगले दिन अल सुबह नेपाल के लिए निकल लेना था। लेकिन अगर योजना के हिसाब से सब कुछ होता तो रावण की तो योजना स्वर्ग तक सीढ़ी बनाने की थी। अर्थात मैं अभी भी घर पर था, मेरी मोटरसाइकिल की चाबी दिल्ली में थी, मोटरसाइकिल में तेल पता नहीं कितना था और न ही इंश्योरेंस था न प्रदूषण सर्टिफिकेट। इसके अलावा दिल्ली से लाए हुए दोनो ट्यूबलेस टायर भी लगाने बाकी थे। अर्थात इस बात की भरपूर संभावना थी कि निकलते निकलते आज शाम हो जाए। खैर सुबह सुबह अपने पड़ोस में रहने वाले मकैनिक रामदुलार को बुलाकर गाड़ी को बिना चाबी के स्टार्ट करने की व्यवस्था बनाई। उसका दावा था कि घर से आठ किलोमीटर दूर भिंगारी बाजार नाम की जगह पर चाबी बन जाएगी। खैर मोटरसाइकिल और टायर लेकर मैं घाँटी पहुंचा और गाड़ी मकैनिक के हवाले कर दी ताकि वह पुराने टायरों को उतारकर नए ट्यूबलेस टायर लगा दे। अगला टायर तो तुरंत लग गया लेकिन पिछला टायर लेकर मैकेनिक 1 घंटे तक जूझता रहा उसके बाद उसने हाथ खड़े कर दिए की टायर ही ठीक नहीं है। मैंने मोटरसाइकिल उठाई और वापस घर पहुंचा। चलते चलते मेरे मित्र व मकैनिक रामदुलार ने स्पार्क प्लग को खोलने के लिए पाना और एक अतिरिक्त स्पार्क प्लग दे दिया ताकि रास्ते में काम आए। मैं अपना सारा तामझाम लेकर वहां से निकला और भिंगारी बाजार पहुंचा और वहां पहुंचते हैं मेरी पुरानी यादें ताजा हो गईं। मैंने चौथी कक्षा से लेकर सातवीं कक्षा तक भिंगारी बाजार में ही स्थित  लिटिल फ्लावर अकैडमी के हॉस्टल में रह कर पढ़ाई की है। किंतु अफसोस मेरे मित्रों में से सिर्फ एक भिंगारी बाजार में है और दुर्भाग्य से वह भी नहीं मिला। खैर पूछते पूछते मैं चाबी बनाने वाले की दुकान पर पहुंचा। उसने गाड़ी देखते ही इनकार कर दिया और कहा कि वह होंडा गाड़ी की चाबी नहीं बना सकता। एक दूसरी दुकान जहां चाबी बन सकती थी वह बंद थी। वहां कहा गया की चाबी भोरे में बन जाएगी जो कि बिहार में स्थित एक कस्बा है और भिनगारी से उसकी दूरी लगभग दस किलोमीटर है। गाड़ी अभी भी रिजर्व में नहीं आई थी इसलिए कोई विशेष चिंता नहीं थी। लेकिन जब भोरे में भी चाबी नहीं बनी और मुझे गोपालगंज जाने की सलाह दी गई तब मेरा चिंतित होना लाजमी था। क्योंकि भोरे से गोपालगंज की दूरी लगभग चालिस किलोमीटर है। जैसे तैसे मैं थावे पहुंचा। थावे से गोपालगंज मात्र छह किलोमीटर रह जाता है। मैंने थावे का जिक्र इसलिए किया क्योंकि हमारी तरफ थावे एक बहुत ही लोकप्रिय तीर्थस्थल है। बच्चों का मुंडन कराने से लेकर  नई गाड़ी खरीदने पर उसकी पूजा कराना सारे काम हमारी तरफ के लोग यही कराते हैं। इसके पीछे भी एक बड़ी दिलचस्प कथा है। कहते हैं यहां का जो राजा था  मनन सिंह  वह भवानी का बहुत बड़ा भक्त था और उसे इस बात का अहंकार था  कि उससे बड़ा भक्त कोई नहीं है। एक बार उसके राज्य में अकाल पड़ा  और लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए।  राजा के महल से थोड़ी ही दूर  रहसू भगत रहता था। वह रोज दिन में घास काटता था और रात को  उस घास की  मड़ाई करने के लिए जंगल से शेर आ जाते थे।  बैलों के बजाय  शेरों को बांधकर  उनसे वह घास की मड़ाई करता था और उसमें से अनाज निकलता था। उस अनाज से  वह आस-पास के लोगों को भोजन कराता था। यह बात फैलते फैलते राजा के पास पहुंची। राजा वहां पर पहुंचा  और उसने पूछा कि यह अनाज तुम्हारे पास कहां से आया। उत्तर में रहसू ने कह दिया यह सब माता की कृपा से ही आता है। राजा को यह विश्वास नहीं हुआ कि उस के घर के पास में ही  कोई उससे भी बड़ा भक्त हो सकता है। इसलिए उसने रहसू को ढोंगी कहा  और उसे भवानी को बुलाने का आदेश दिया। उसने राजा से प्रार्थना की  कि ऐसा करने से  भवानी कुपित हो जाएगी  और सब कुछ बर्बाद कर देंगी। लेकिन राजा अपनी जिद पर अड़ा रहा।  फिर रहसू ने  देवी को  कामाख्या से बुलाया। आते हुए देवी  कोलकाता और छपरा में रुकीं और वहां पर आज भी सिद्ध पीठ है। उसके पश्चात  देवी ने  रहसू का सिर फाड़ कर  स्वयं को प्रकट किया। राजा की भी वही मृत्यु हो गई और उसका भवन महल  भी गिर गया। इस प्रकार वहां मंदिर की स्थापना हुई। आज भी लोग पहले देवी का दर्शन करने के पश्चात रहसू भगत के आश्रम में जाकर  उनका दर्शन अवश्य करते हैं। यह मंदिर हथुवा के राजा की संपत्ति है जो कि आम जनता के लिए खुला हुआ है। गोपालगंज मैं शहर के अंदर ट्रैफिक से जूझता हुआ चाबी बनाने वाले के पास पहुंचा। तब तक दोपहर के लगभग एक बज चुके थे और मैं घर से करीब साठ किलोमीटर ही यात्रा कर सका था। खैर वहां पर चाबी बन गई और वहां से मैं हाईवे की तरफ बढ़ा। नेशनल हाईवे नंबर सत्ताइस गोपालगंज से होकर निकलता है। मुझे भी उसी हाईवे से होकर आगे बढ़ना था। हाईवे के नजदीक मुझे एक टायर रिपेयर की दुकान दिखी। मैंने गाड़ी खड़ी की और रिपेयर वाले से ट्यूबलेस टायर लगाने को कहा और स्वयं बगल में ही एक ढाबे में खाना खाने चला गया। वहां पर रोटी और मटन का ऑर्डर दिया। दुकान पर भीड़ अच्छी खासी थी और बंदे थे सिर्फ दो। और वो भी बात बात पर ग्राहकों पर भड़क रहे थे। लेकिन फिर भी भीड़ कम नहीं हो रही थी। और क्यों कम नहीं हो रही थी यह मुझे खाना खाते समय पता चला। क्या शानदार मटन बनाया था उन्होंने। आनंद आ गया। खाने के बाद बिल चुका कर मैं वापस टायर वाले के पास आया तो उसने मुझे स्पष्ट रूप से बता दिया कि यह टायर सेट नहीं हो सकता इसमें कोई मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट है। अब मैं क्या करता पुराना टायर बुरी तरह से घिस चुका था। तो उसी ने एक आईडिया दिया और कहा की पुरानी ट्यूब को ही नए ट्यूबलेस टायर में लगवा लीजिए तो किनारों से हवा की लीकेज बंद हो जाएगी और आपको ट्यूबलेस टायर की शक्ति भी मिल जाएगी। मरता क्या न करता। मेरे पास कोई दूसरा ऑप्शन तो था नहीं। तो मैंने यही किया उसके बाद गाड़ी स्टार्ट की हाईवे किनारे पेट्रोल लिया और गाड़ी को भगा लिया। हाईवे पकड़ते पकड़ते लगभग ढाई बज चुके थे। अब मेरा लक्ष्य था मुजफ्फरपुर, क्योंकि मुझे लगा कि इसके आगे मैं आज नहीं जा सकता। गोपालगंज से लगभग 50 किलोमीटर के बाद हाईवे गंडक नदी को पार करता है। थोड़ी देर आराम करने के लिए मैं पुल पर रुका, कुछ फोटोग्राफी की, और फिर मोटरसाइकिल पर सवार हो गया। आगे पिपराकोठी नाम की जगह पर नेशनल हाईवे 527 डी आकर नेशनल हाईवे 27 में मिल जाता है। यह मार्ग एशियन हाईवे 42 कहलाता है। नेशनल हाईवे 42 चीन के लांझू नामक जगह से नेपाल होते हुए बिहार के नवादा के पास बाढ़ी नामक जगह तक जाता है। तो यहां से मुजफ्फरपुर तक हम एशियन हाईवे संख्या 42 पर थे। मुजफ्फरपुर पहुंचते पहुंचते शाम के छह बज गए थे। नवंबर का महीना होने के कारण हम इसे रात के छह भी कह सकते हैं क्योंकि अंधेरा हो चुका था और लाइट्स जल चुकी थी। क्योंकि अभी छह बज रहे थे इसलिए मैंने और आगे जाने का फैसला किया और लक्ष्य दरभंगा को रखा। मुजफ्फरपुर से एशियन हाईवे 42 को छोड़कर नेशनल हाईवे संख्या 27 पर ही आगे बढ़ जाने पर मैं दरभंगा की तरफ बढ़ गया। मुजफ्फरपुर से दरभंगा करीब 75 किलोमीटर दूर है इसलिए मुझे भी कोई जल्दी नहीं थी और मैं आराम से जा रहा था। रास्ते में एक ढाबा देखकर रुका। ढाबे में कोई ग्राहक नहीं था। बस 2-3 कर्मचारी थे जो रात के खाने की तैयारी कर रहे थे। मैंने पूछा नाश्ते में क्या मिल सकता है तो सीधा जवाब मिला घुघुनी या पनीर पकोड़ा। यानी या तो धुर बिहारी नाश्ता या फिर दिल्ली वाला। मुझे बिहारी खाना बहुत पसंद है लेकिन घुघुनी बिल्कुल पसंद नहीं है। इसलिए मैंने पनीर पकौड़ा का ऑर्डर दे दिया। वहां बैठकर मैंने बड़े मजे से पनीर पकोड़े खाए और एक बार फिर मोटरसाइकिल पर बैठ कर आगे बढ़ गया। हाईवे पर सीधे चलते चले जाएं तो रेलवे लाइन पार करने के बाद एक चौराहा आता है। उस चौराहे से दाहिने मुड़ जाने पर अप दरभंगा शहर में प्रवेश कर जाते हैं। लेकिन गूगल बाबा की जय हो। उन्होंने उस चौराहे से करीब 10 किलोमीटर पहले ही मुझे दाहिनी तरफ मोड़ दिया और सिंगल लेन की सुनसान सड़क पर  दौड़ा दिया। और सड़क भी ऐसी सुनसान कि न कोई इंसान दिखे ना कोई घर दिखे ना कोई दुकान दिखे। बीच-बीच में एकाध ट्रक वाले सामने से आ जाते। ऐसे ही समय में सबसे ज्यादा भगवान की याद आती है। जैसे तैसे मैं दरभंगा पहुंचा। फिर गूगल महाराज ने दरभंगा के सारे गली कूचे घुमा कर एक गंदे से मोहल्ले में यह कह कर खड़ा कर दिया लो भाई साहब यही दरभंगा है। मैंने कहा रहने दो गूगल महाराज आप केवल नक्शा दिखाओ जाना कहां है वह मैं तय करूंगा। उसके बाद मैंने नक्शे में मेन मार्केट खोजा और उसकी तरफ चलता हुआ मैं हाजमा चौक पहुंचा। अभी लगभग 8 ही बज रहे थे इसलिए पूरा शहर जगा हुआ था और मार्केट में चहल पहल थी। मैं लहरिया सराय टावर चौक के पास एक होटल में कमरा लिया, हाथ मुंह धो कर बाजार में खाना खाने निकला। चिकन लॉलीपॉप और रोटी खाया और आकर चैन से सो गया। जै जै
तैयारी पूरी



चाबी बनते हुए

गोपालगंज से आगे बढ़ने को तइयार

पनीर पकौड़े

गंडक पुल पर




गंडक पुल पर