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बुधवार, 2 जनवरी 2019

दो पहियों पर पूर्वोत्तर : चौथा पड़ाव : नलबाड़ी

26 नवंबर 2018 सोमवार
सिंगथाम एनएचपीसी

आज के लिए मैंने कोई लक्ष्य नहीं रखा था। चूंकि मैं वास्तविक योजना से काफी पीछे चल रहा था इसलिए आज मैंने अधिक से अधिक दूरी तय करने का मन बनाया था। सुशांत तो सुबह जल्दी उठ कर ऑफिस निकल गया और मुझसे मिलते हुए जाने को कहता गया। मुझे इससे कोई समस्या नहीं थी क्योंकि उसका ऑफिस रास्ते में ही था। भाभी जी ने गर्मागर्म आमलेट का नाश्ता कराया। फिर उनसे विदा ले कर मैं वहां से निकला। थोड़ी देर में मैं सुशांत के आफिस में पहुंचा जहां मुझे पता चला की साहब जीरो साइट पर हैं। सड़कों पर साइटों के नाम किलोमीटर पर आधारित होते हैं। किसी साइट का नाम इस बात को दर्शाता है कि वह बेस प्वाइंट से कितनी दूर है। इसलिए जीरो साईट यानी वह जगह जहां से सड़क  का यह सेक्शन शुरू होता है जो कि सिंगथाम में था। मैं वहां पहुंचा तो सुशांत यूनीफार्म चढ़ाए, मुंह पर डस्ट मास्क चढ़ाए अपने काम में लगा हुआ था। उससे मिल कर मैंने विदा ली और वापस निकल लिया। कल जिस रास्ते से मैं यहां आया था आज उसी रास्ते से वापस जा रहा था और ऐसा करना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है। लेकिन इसके सिवा कोई दूसरा चारा भी नहीं था क्योंकि दूसरा रास्ता बहुत मुश्किल और बहुत लंबा था और मैं ऑलरेडी अपनी योजना से पीछे चल रहा था। सिंगथाम से रांगपो को पहुंचा फिर वहां से वापस चलता हुआ आगे बढ़ा। उतरने में एक्सीलरेटर की जरूरत कम और क्लच ब्रेक की जरूरत ज्यादा पड़ रही थी। 10-12 किलोमीटर आने के बाद मेरी गाड़ी ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। स्टार्ट करने पर स्टार्ट तो हो जाए लेकिन  क्लच छोड़ते ही बंद हो जाए। फिर मैंने  धक्का देकर आगे बढ़ाने की कोशिश की तो भी गाड़ी ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। तब मुझे पता चला कि अगले पहिये में मौजूद डिस्क ब्रेक जाम हो गया है। सामने ही एक छोटा सा रेस्टोरेंट था। मैं उस में जाकर बैठ गया और विचार करने लगा कि क्या किया जाए। सबसे पहले अपने मित्र मकैनिक चुलबुल को फोन लगाया लेकिन उसका फोन लग ही नहीं रहा था। सही बात है बुरे समय में तो साया भी साथ छोड़ देता है। उसके बाद मैंने अपने एक दूसरे मित्र पवन को जिसकी दुकान चुलबुल की दुकान के पास में ही है, को फोन लगाया और उससे चुलबुल से बात कराने को कहा तो पता चला कि चुलबुल बाबू कहीं गए हुए हैं। मैंने कहा, भाई उसकी दुकान के किसी भी मैकेनिक से बात करा दो। तो मेरी बात उसके छोटे भाई राम ज्ञान से हुई। उसने मुझे बताया की 11 नंबर पाना से एक छोटे से नट, जिसके ऊपर एक छोटा सा नोजल बना हुआ होगा और वह रबर की कैप से ढका हुआ होगा को ढीला करने से ब्रेक ढीला हो जाएगा। मुझे वह नट तो आराम से मिल गया लेकिन वहां बीच रास्ते में 11 नंबर पाना कहां से लाता। जब कुछ नहीं सूझा तो सामने के होटल में बैठकर दो अंडों के साथ एक प्लेट मैगी का ऑर्डर दे दिया और बैठकर सोचने लगा। मैं जब भी परेशान होता हूं तो सारी झल्लाहट, सारा गुस्सा, सारी परेशानी खाने पर निकालता हूं। घर पर भी अगर मैं अपने नियमित भोजन से ज्यादा खाने लगता हूं तो मेरी पत्नी समझ जाती है कि आज मैं परेशान हूं। मेरे खाने के दौरान ही एक पिक-अप वाला आया और वह भी खाना मंगा कर कर खाने लगा। मैंने अपनी मैगी खत्म की और उससे पूछा क्या उसके पास 11 नंबर पाना है तो उसका जवाब सकारात्मक निकला और बोला खाना खा कर देता हूं। मैं प्रतीक्षा करने लगा लेकिन बीच में ही उसने अपने क्लीनर को आवाज लगाई और पाना देने को कहा। क्लीनर से पाना लेकर मैं वह नट खोलने की कोशिश करने लगा। लेकिन जब किस्मत ही खराब हो तो इंसान हाथी पर भी बैठा हो तो कुत्ता काट लेता है। वह नट काफी पुराना लगा हुआ था और इसलिए बहुत जाम था। अंत में कट पाना उसके ऊपर फिसल गया। मैं तो बुरी तरह से इरिटेट हो गया। बड़ी मुश्किल से तो कटपाना मिला था लेकिन वह फिसल गया। अब मैं यहां रिंग पाना कहां खोजूं। उस नट के पीछे भी एक नट लगा हुआ था जिस को ढीला करने पर हाइड्रॉलिक ऑयल निकल सकता था और शायद उससे ब्रेक ढीला हो जाता। लेकिन उसके लिए  15 नंबर पाना चाहिए था जो कि पिक अप वाले के पास नहीं था। मैंने चाकू निकाला और ब्रेक का हाइड्रोलिक पाइप काट देने का फैसला किया। लेकिन शायद भाग्य इतना ज्यादा भी मेरे विरुद्ध नहीं था। एक ट्रक वाला भी उसी होटल में खाना खा रहा था। पिक अप के ड्राइवर ने उससे 15 नंबर पाना का जुगाड़ कर दिया और लेकर मेरे पास आया। लेकिन तब तक मैं आधा हाइड्रोलिक पाइप काट चुका था भाग्य ठीक था कि अब तक चाकू पाइप के बीच तक नहीं पहुंचा था इसलिए कोई लीकेज नहीं हुई थी। हमने नट ढीला किया और नट ढीला होते ही ब्रेक छूट गया। मैंने उन दोनों ड्राइवरों को धन्यवाद दिया, खाने का भुगतान किया और गाड़ी स्टार्ट कर के आगे बढ़ गया। आगे बढ़ते हुए मैंने तीस्ता ब्रिज पार किया, फिर मैंने तीस्ता पर बने बांध को पार किया और करीब 1 घंटे बाद मैं उस जगह पर पहुंच गया जहां से से मुझे सिलीगुड़ी का रास्ता छोड़कर पुल पार कर लेना था। तीस्ता नदी पर बने पुल का नाम कोरोनेशन ब्रिज है। कोरोनेशन का मतलब होता है राज्याभिषेक। 1937 में जब किंग जॉर्ज सिक्स्थ का राज्याभिषेक हुआ तो उसकी याद में इस पुल का निर्माण शुरू कराया गया था जो कि 1941 में बनकर पूरा हुआ और आम जनता के लिए खोल दिया गया। स्थानीय लोग इसे बाघपुल नाम से पुकारते हैं। यहां से नेशनल हाईवे नंबर 17 शुरू हो जाता है और वह रेलवे लाइन के साथ साथ चलता रहता है। जल्दी ही ऊंची पहाड़ियों से निकल कर सड़क थोड़े खुले इलाके में आ गई। इसके बाद मैंने गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी क्योंकि सड़क के दोनों तरफ चाय बागान थे इसलिए  किनारों से किसी जानवर या इंसान के आने का खतरा नहीं था। चलता हुआ मैं उदलाबाड़ी में एक मैकेनिक के यहां रुका और अगला ब्रेक देखने को कहा। उसने देखते ही कह दिया कि आपके रबर पैड्स घिस चुके हैं और पूरी नई किट लगानी पड़ेगी और नई किट आपको एजेंसी में ही मिलेगी जो कि आगे माल बाजार में है। ब्रेक को मैंने पूरा ढीला कर दिया था लेकिन अब तक वह फिर से आधा टाइट हो चुका था। माल बाजार वहां से थोड़ी ही दूर है। मैं वहां ढूंढते हुए  होंडा के सर्विस सेंटर पहुंचा लेकिन उनके कर्मचारियों ने मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। उन्होंने मेरे रिक्वेस्ट करने पर भी 2 घंटे से पहले गाड़ी को हाथ लगाने से मना कर दिया। मैं झल्ला कर वहां से वापस निकला और एक मैकेनिक यहां रुका। उसने ब्रेक को फिर से ढीला कर दिया और मुझे 11 नबर का रिंग पाना खरीद कर दे दिया कि रास्ते में अगर फिर से ब्रेक जाम हो जाए तो परेशानी ना हो। अगला ब्रेक लगना लगभग बंद हो गया और मैंने इसको गंभीरता पूर्वक नहीं लिया जिससे कि आगे मैं मुसीबत में भी फंस गया। आगे की बात बाद में करेंगे। फिलहाल मैं माल बाजार से आगे बढ़ा। माल बाजार से आगे जलढाका नदी पार की और चलते हुए मध्यमदारी हाट पहुंचा और वहाँ छोटे से रेस्टोरेंट में रुककर लंच किया। लंच में चावल दाल और साग के साथ पता नहीं कौन सी मछली थी। साथ में आमलेट भी ले लिया। लेकिन सबसे ज्यादा मजा साग में ही आया। वहां से निबट कर एक बार फिर चाय के बागानों के बीच से उड़ता हुआ में आगे बढ़ा। आगे तोर्षा नदी पार करके अलीपुरद्वार को बाईपास करता हुआ मैं आगे बढ़ा। अलीपुरद्वार को पार करते ही नेशनल हाईवे 317 खत्म हो जाता है और एक बार फिर नेशनल हाईवे 27 चालू हो जाता है। नेशनल हाईवे 27को  मैंने सिलीगुड़ी में छोड़ा था और अलीपुरद्वार मैं मैं वापस इसी पर आ गया। अब तक की यात्रा का लगभग 80% हिस्सा मैंने नेशनल हाईवे 27 पर तय किया था। चाकचोका से कुछ आगे गदाधर नदी पार करते ही हम बंगाल से असम में प्रवेश कर जाते हैं। मैं बिना रुके चलता रहा और लगभग 6:00 बजे बंगाईगांव पहुंच गया। बबीता कोमल जी नलबाड़ी में रहती हैं और मुझे उनसे मिलना था। उनका उपन्यास मैं हूं बबली - एक लड़की प्रकाशित हो चुका है और इस सीरीज के दो उपन्यास और आने वाले हैं। इसकी कहानी का अधिकांश हिस्सा बंगाई गांव में ही चलता है इसलिए मुझे यह जगह परिचित सी लगी। मैं काफी थक चुका था। लेकिन नलबाड़ी यहां से 120 किलोमीटर ही दूर था तो मैंने तय किया कि आज नलबाड़ी ही चलते हैं। 4-लेन की सड़क है। 120 किलोमीटर की दूरी हद से हद तीन घंटे में पूरी हो जाएगी।

लेकिन एक बार फिर यही कहूंगा कि सोचा हुआ कहां हो पाता है। चार लेन की सड़क में दो लेन बंद थी। और बची हुई दो लेनो में ट्रकों की लाइनें लगी थी। और कोढ़ में खाज का काम किया बरपेटा रोड में हो रही रास पूजा ने। नलबाड़ी पहुंचते पहुंचते रात के ग्यारह बज चुके थे। वहां भी रास पूजा हो रही थी और सारा शहर जगा हुआ था। फिर भी रात के ग्यारह बजे किसी का दरवाजा खटखटाना, वह भी ऐसे व्यक्ति का जिससे आप पहले कभी नहीं मिले हों घनघोर असभ्यता कहलाएगी। इसलिए मैंने होटल खोजना शुरू किया। एक छोटा सा जिला मुख्यालय जहां पर गिनती के होटल हों, में आधी रात के लगभग होटल खोजना भी कष्ट साध्य काम था। लेकिन पूजा के वजह से  लोग जगे हुए थे। पूछताछ करने पर  मुझे होटल प्रेमोदय का रास्ता समझा दिया गया। होटल पहुंचने पर पता चला कि पूजा के कारण होटल पूरा भरा हुआ है। इस बार मैंने गूगल देवता का आह्वान किया और उन्होंने बताया शहर से बाहर हाईवे पर एक होटल बोरदोईशिला है। मैं वहां पहुंचा लेकिन वहां पर भी यही हालत। मुझे लगा कि आज तो मुझे अपना टेंट और स्लीपिंग बैग निकालना ही पड़ेगा। लेकिन मैंने एक आखरी बार गूगल देवता की मदद ली और उन्होंने मुझे एक छोटे से होटल के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। वहां पर मुझे ₹400 में एक घटिया सा कमरा मिला। खैर, कमरा मिल गया यही बड़ी बात थी। खाना तो मैंने रास्ते में ही रुक कर खा लिया था क्योंकि मुझे अंदाजा था कि देर होने के कारण नलबाड़ी में खाना नहीं मिलेगा। चूंकि पूरा दिन भागते हुए बीता था इसलिए आज के फोटो गिनती के ही हैं।

जै जै
सुशांत के साथ

लंच


मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

दो पहियों पर पूर्वोत्तर : तीसरा पड़ाव : सिंगथाम एनएचपीसी

25 नवंबर रविवार
सिलीगुड़ी

आज चादर तान कर देर तक सोता रहा। आज उठने की कोई जल्दी भी नहीं थी क्योंकि आज ज्यादा दूरी तय नहीं करनी थी। सिम्मी की दोस्त क्रिपा का घर रांगपो से 12- 15 किलोमीटर ही दूर था और सिलीगुड़ी से रांगपो लगभग 80 किलोमीटर है। आराम से आठ बजे तक तैयार हुआ और होटल से चेक आउट कर दिया। सोचा नाश्ता रांगपो में ही करूंगा और मोटरसाइकिल दौड़ा दी। सुबह का समय था इसलिए सिलीगुड़ी में कुछ खास ट्रैफिक नहीं मिला। नदी के पास पहुंचने पर सड़क महानंदा अभयारण्य में घुस जाती है। अभयारण्य के अंदर गाड़ी चलाने का मजा ही कुछ और है। दोनों तरफ ऊंचे ऊंचे सीधे खड़े पेड़, सड़क पर ना के बराबर ट्रैफिक और थोड़ी दूरी पर आप के समानांतर चलती हुई तीस्ता नदी जो कि कभी नजर आए कभी छुप जाए। इस स्वर्ग जैसे नजारे का आनंद अनुभव ही किया जा सकता है, वर्णन नहीं किया जा सकता। इसलिए इस नजारे के सौंदर्य के लिए मैं नेति, नेति( अर्थात इतना ही नहीं, इतना ही नहीं) कह कर आगे बढ़ता हूं। थोड़ा आगे जाने पर रेलवे लाइन ने हाईवे को क्रॉस किया और उसके बाद बकायदा पहाड़ी रास्ता शुरू हो गया। जीवन में पहली बार मैं पहाड़ी में मोटरसाइकिल चला रहा था। सोच कर तो बहुत डर लगता था लेकिन एक बार जब आगे बढ़ा तो आत्मविश्वास आ गया। वैसे भी चढ़ाई उतराई की अपेक्षा आसान होती है। अब मैं तीस्ता नदी के बिल्कुल किनारे किनारे चल रहा था। थोड़ा आगे जाने पर तीस्ता नदी पर बना एक बांध दिखा जिसका नाम तीस्ता  लोवर डैम नंबर फोर लिखा हुआ था लेकिन मुझे उसकी हेड रेज टनल कहीं नहीं दिखी। बाद में मैंने गूगल मैप पर भी उसके पावर हाउस का लोकेशन खोजने की कोशिश की लेकिन वो भी नहीं मिला। यदि किसी मित्र को पता हो कि इस डैम का पावर हाउस कहां पर है और हेड रेज टनल कहां से निकलती है तो बड़ी कृपा होगी। सड़क कहीं बहुत अच्छी थी तो कहीं बहुत खराब थी। पहाड़ी सड़कें सामान्यतः रिज लाइन पर तो बहुत अच्छी होती है लेकिन वैली लाइन पर खराब हो जाती है। वास्तव में होता यह है कि सड़क का जो हिस्सा रिज लाइन यानी धार पर होता है उस पर पानी आता नहीं और आता भी है तो टिकता नहीं इसलिए सड़क अच्छी होती है। जबकि इसके विपरीत वैली लाइन यानी की घाटी की लाइन पर सारा पानी इकट्ठा होकर आता है और हल्की बारिश में भी वहां छोटा-मोटा नाला या झरना बन जाता है। डामर की सड़क का पानी जानी दुश्मन है इसलिए वहां की सड़क खराब हो जाती है। जंगल पहाड़ और नदी का आनंद लेते हुए मैं आगे बढ़ता जा रहा था। अब भूख लगने लगी थी तो रंबी बाजार में नाश्ता करने के लिए रूक गया। एक ठीक ठाक से होटल में घुसा और खाने के बारे में पूछताछ करके तड़का-रोटी का आर्डर दे दिया। फिर कुछ सोच के आमलेट के लिए भी बोला तो दुकान वाले ने सुझाव दिया कि अंडे को तड़के में मिला दिया जाय। खाने के मामले में प्रयोग करना मुझे बहुत पसंद है सो मैंने तत्काल सहमति दे दी। और विश्वास मानिए मुझे बिल्कुल निराश नहीं होना पड़ा। चार रोटियां और एक प्लेट चावल दबा कर आगे बढ़ा। आराम से चलते हुए लगभग सवा नौ बजे तीस्ता बाजार स्थित तीस्ता पुल पर पहुंच गया। यहां तीस्ता नदी पार न कर सीधे चलें जाएं तो दार्जिलिंग की तरफ चले जाएंगे जबकि यदि नदी पार कर दाहिनी तरफ मुड़ जाएं तो कलिंपोंग पहुंच जाएंगे। मुझे इनमें से कहीं नहीं जाना था इसलिए तीस्ता पुल पर कुछ फोटो क्लिक करने के बाद पुल पार कर के सीधा रास्ता पकड़ लिया जो रांगपो जाता है। थोड़ा आगे जहां रंगीत और तीस्ता नदियों का संगम होता है वहां से नदी के दूसरी ओर सिक्किम शुरू हो जाता है अर्थात मैं बंगाल में चल रहा था लेकिन सिक्किम के साथ साथ चल रहा था। यहां से रांगपो तक तीस्ता नदी ही बंगाल और सिक्किम की सीमा बनाती है। रांगपो से तीस्ता नदी गांतोक की तरफ निकल जाती है और सिक्किम और बंगाल की सीमा रांगपो नदी के साथ चलने लगती है। अब यहां से मुझे जाना था सेंट्रल पैंडम। गूगल मैप में लिखकर सर्च किया तो फौरन मिल गया और मैंने नेविगेशन ऑन करके गाड़ी उस तरफ बढ़ा दी। अब नेशनल हाईवे छोड़ कर मुझे ग्रामीण सड़कों पर चलना था। थोड़ा आगे जाते ही मुख्य सड़क छोड़कर एक लेन की सड़क पर निकलना पड़ा। एक तो पतली सड़क ऊपर से जबरदस्त चढ़ाई। गाड़ी दो नंबर से ऊपर नहीं जा पा रही थी लेकिन नजारे भी उतने ही सुंदर थे। मैं आनंद लेता हुआ आगे बढ़ रहा था। लगभग 10 किलोमीटर जाने के बाद गूगल देवता ने मुझे इस सड़क को भी छोड़ कर एक कच्ची सड़क पर उतरने को कहा। मैं उतर गया। तीन चार किलोमीटर आगे जाने के बाद एक सज्जन से मैंने गांव के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि अभी आपको पक्की सड़क पकड़कर ही तीन-चार किलोमीटर आगे जाना था। मैंने गूगल देवता के सम्मान में दो चार अच्छी अच्छी बातें कहीं और फैसला किया वापस लौटते ही गूगल मैप पर इस गांव का लोकेशन सही करूंगा। वापस पहले वाली सड़क पर आ गया और आगे बढ़ा। चार किलोमीटर आगे जाने के बाद एक बड़ी प्यारी जगह मिली। पूरी ढलान पर पीले पीले फूल खिले थे। ऊपर से नीचे तक पूरा पहाड़ पीला ही दिख रहा था। पता नहीं यह फूल प्राकृतिक थे या किसी ने खेती की थी लेकिन नजारा जबरदस्त था। मैंने सोचा वापसी मैं इस की फोटोग्राफी करूंगा और आगे बढ़ गया। लगभग 1 किलोमीटर और आगे जाने के बाद एक बार फिर मैंने उस गांव के बारे में पूछा और एक बार फिर मुझसे कहा गया कि आप ज्यादा आगे आ गए हैं। दो किलोमीटर पीछे जाइए। वहां से एक सड़क बाईं तरफ ऊपर की ओर जाती हुई मिलेगी उस पर जाना है। मैंने गाड़ी वापस घुमाई और उस फूलों भरी जगह पर आ गया। थोड़ी देर विश्राम किया, दो चार सेल्फीली। कैमरा निकाल कर कुछ फोटो भी खींचे फिर क्रिपा को कॉल किया। उसने मुझसे कहा कि आप वीडियो कॉल करिए तो मैं बता दूंगी आप कहां हैं और किधर जाना है। मैंने वीडियो कॉल भी किया लेकिन उसको कोई आईडिया नहीं मिला। मैंने गाड़ी वापस घुमाई तो थोड़ी दूरी पर सच में एक तिराहा था और एक सड़क ऊपर की तरफ जा रही थी मैंने वह सड़क पकड़ ली और आगे जाने पर क्रिपा की बताई हुई निशानियां जैसे लाल रंग का मंदिर, एक पीले रंग का घर और एक हाई स्कूल नजर आईं। जब हाई स्कूल दिखा तो मैं वहां रुक गया और फिर मैंने फिर क्रिपा को फोन किया और कहा मैं हाई स्कूल पर हूं तो जवाब में मुझे एक बार फिर यही सुनने को मिला कि आप आगे आ गए हैं। दो सौ मीटर पीछे आइए। मेरा घर मंदिर के पास है और मेरे घर के सामने की स्कॉर्पियो खड़ी होगी। राय साहब एक बार फिर वापस मुड़े लेकिन इस बार ठीक ठीक बताए गए घर तक पहुंच गए। घर पर क्रिपा की माताजी मिलीं जो की एक शिक्षिका हैं। उसके भैया भाभी जो कि रंगपो में रहते हैं वह कहीं बाहर गए हुए थे और संजोग से उसके पिताजी भी बाहर ही गए हुए थे। घर पर केवल उसकी माताजी और उसकी छोटी बहन मिले। उनसे काफी सारी बातें हुई और बढ़िया सा लंच हुआ। इसी बीच हमारा मित्र शुशांत सिंह जोकि आजकल सीमा सड़क संगठन में कार्यरत है आजकल सिक्किम में ही पोस्टेड है। मैं सुबह से ही उसको कॉल लगाने की कोशिश कर रहा था और कॉल नहीं लग रही थी उसे कॉल लग गई और उसने रात्रि विश्राम के लिए उन्होंने अपने यहां आमंत्रित किया। वह एनएचपीसी के कैंप कॉलोनी में रहता है। रांगपो से सिंगथाम अठारह किलोमीटर है और सिंगथाम से एनएचपीसी की कॉलोनी लगभग 7 किलोमीटर है। मैं वापस रंगपो आया और सिंगथाम का रास्ता पकड़ लिया। पूछते पूछते मैं कॉलोनी तक तो पहुंच गया लेकिन आज सुबह से जैसा कि हर बार होता आया था, जहां से मुझे सड़क छोड़नी थी उससे लगभग दो किलोमीटर आगे बढ़ गया फिर शुशांत को फोन लगाया। उसने वापस आने को कहा। मैं वापस आया तो कॉलोनी के गेट पर शुशांत अपनी कार के साथ खड़ा था। मैं उसके साथ उसके घर पहुंचा। घर पर उसकी पत्नी और बेटी से मुलाकात हुई। अभी सूरज डूब ही रहा था और मैं अपने लक्ष्य तक पहुंच चुका था। आज मैं मात्र 120 किलोमीटर की यात्रा किया था। शुशांत के घर पर शाम अच्छी व्यतीत हुई हम लोग बैठ के काफी देर तक बातें करते रहे। रात को खाने में देसी मुर्गे की मोटी सी टांग थी। पूरे पूर्वोत्तर में जहां भी मुझे मुर्गे की टांग मिली जंबो साइज ही मिली। पता नहीं क्यों दिल्ली वाले ऐसी टांग वाले मुर्गे क्यों नहीं बेचते। आज के लिए सिर्फ इतना ही ।
जै जै
सिलिगुड़ी से प्रस्थान

तीस्ता




फूलों की घाटी




कृपा के घर

रंबी बाजार में नाश्ता

तीस्ता पुल पर

कृपा के घर शानदार लंच