मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

दो पहियों पर पूर्वोत्तर : तीसरा पड़ाव : सिंगथाम एनएचपीसी

25 नवंबर रविवार
सिलीगुड़ी

आज चादर तान कर देर तक सोता रहा। आज उठने की कोई जल्दी भी नहीं थी क्योंकि आज ज्यादा दूरी तय नहीं करनी थी। सिम्मी की दोस्त क्रिपा का घर रांगपो से 12- 15 किलोमीटर ही दूर था और सिलीगुड़ी से रांगपो लगभग 80 किलोमीटर है। आराम से आठ बजे तक तैयार हुआ और होटल से चेक आउट कर दिया। सोचा नाश्ता रांगपो में ही करूंगा और मोटरसाइकिल दौड़ा दी। सुबह का समय था इसलिए सिलीगुड़ी में कुछ खास ट्रैफिक नहीं मिला। नदी के पास पहुंचने पर सड़क महानंदा अभयारण्य में घुस जाती है। अभयारण्य के अंदर गाड़ी चलाने का मजा ही कुछ और है। दोनों तरफ ऊंचे ऊंचे सीधे खड़े पेड़, सड़क पर ना के बराबर ट्रैफिक और थोड़ी दूरी पर आप के समानांतर चलती हुई तीस्ता नदी जो कि कभी नजर आए कभी छुप जाए। इस स्वर्ग जैसे नजारे का आनंद अनुभव ही किया जा सकता है, वर्णन नहीं किया जा सकता। इसलिए इस नजारे के सौंदर्य के लिए मैं नेति, नेति( अर्थात इतना ही नहीं, इतना ही नहीं) कह कर आगे बढ़ता हूं। थोड़ा आगे जाने पर रेलवे लाइन ने हाईवे को क्रॉस किया और उसके बाद बकायदा पहाड़ी रास्ता शुरू हो गया। जीवन में पहली बार मैं पहाड़ी में मोटरसाइकिल चला रहा था। सोच कर तो बहुत डर लगता था लेकिन एक बार जब आगे बढ़ा तो आत्मविश्वास आ गया। वैसे भी चढ़ाई उतराई की अपेक्षा आसान होती है। अब मैं तीस्ता नदी के बिल्कुल किनारे किनारे चल रहा था। थोड़ा आगे जाने पर तीस्ता नदी पर बना एक बांध दिखा जिसका नाम तीस्ता  लोवर डैम नंबर फोर लिखा हुआ था लेकिन मुझे उसकी हेड रेज टनल कहीं नहीं दिखी। बाद में मैंने गूगल मैप पर भी उसके पावर हाउस का लोकेशन खोजने की कोशिश की लेकिन वो भी नहीं मिला। यदि किसी मित्र को पता हो कि इस डैम का पावर हाउस कहां पर है और हेड रेज टनल कहां से निकलती है तो बड़ी कृपा होगी। सड़क कहीं बहुत अच्छी थी तो कहीं बहुत खराब थी। पहाड़ी सड़कें सामान्यतः रिज लाइन पर तो बहुत अच्छी होती है लेकिन वैली लाइन पर खराब हो जाती है। वास्तव में होता यह है कि सड़क का जो हिस्सा रिज लाइन यानी धार पर होता है उस पर पानी आता नहीं और आता भी है तो टिकता नहीं इसलिए सड़क अच्छी होती है। जबकि इसके विपरीत वैली लाइन यानी की घाटी की लाइन पर सारा पानी इकट्ठा होकर आता है और हल्की बारिश में भी वहां छोटा-मोटा नाला या झरना बन जाता है। डामर की सड़क का पानी जानी दुश्मन है इसलिए वहां की सड़क खराब हो जाती है। जंगल पहाड़ और नदी का आनंद लेते हुए मैं आगे बढ़ता जा रहा था। अब भूख लगने लगी थी तो रंबी बाजार में नाश्ता करने के लिए रूक गया। एक ठीक ठाक से होटल में घुसा और खाने के बारे में पूछताछ करके तड़का-रोटी का आर्डर दे दिया। फिर कुछ सोच के आमलेट के लिए भी बोला तो दुकान वाले ने सुझाव दिया कि अंडे को तड़के में मिला दिया जाय। खाने के मामले में प्रयोग करना मुझे बहुत पसंद है सो मैंने तत्काल सहमति दे दी। और विश्वास मानिए मुझे बिल्कुल निराश नहीं होना पड़ा। चार रोटियां और एक प्लेट चावल दबा कर आगे बढ़ा। आराम से चलते हुए लगभग सवा नौ बजे तीस्ता बाजार स्थित तीस्ता पुल पर पहुंच गया। यहां तीस्ता नदी पार न कर सीधे चलें जाएं तो दार्जिलिंग की तरफ चले जाएंगे जबकि यदि नदी पार कर दाहिनी तरफ मुड़ जाएं तो कलिंपोंग पहुंच जाएंगे। मुझे इनमें से कहीं नहीं जाना था इसलिए तीस्ता पुल पर कुछ फोटो क्लिक करने के बाद पुल पार कर के सीधा रास्ता पकड़ लिया जो रांगपो जाता है। थोड़ा आगे जहां रंगीत और तीस्ता नदियों का संगम होता है वहां से नदी के दूसरी ओर सिक्किम शुरू हो जाता है अर्थात मैं बंगाल में चल रहा था लेकिन सिक्किम के साथ साथ चल रहा था। यहां से रांगपो तक तीस्ता नदी ही बंगाल और सिक्किम की सीमा बनाती है। रांगपो से तीस्ता नदी गांतोक की तरफ निकल जाती है और सिक्किम और बंगाल की सीमा रांगपो नदी के साथ चलने लगती है। अब यहां से मुझे जाना था सेंट्रल पैंडम। गूगल मैप में लिखकर सर्च किया तो फौरन मिल गया और मैंने नेविगेशन ऑन करके गाड़ी उस तरफ बढ़ा दी। अब नेशनल हाईवे छोड़ कर मुझे ग्रामीण सड़कों पर चलना था। थोड़ा आगे जाते ही मुख्य सड़क छोड़कर एक लेन की सड़क पर निकलना पड़ा। एक तो पतली सड़क ऊपर से जबरदस्त चढ़ाई। गाड़ी दो नंबर से ऊपर नहीं जा पा रही थी लेकिन नजारे भी उतने ही सुंदर थे। मैं आनंद लेता हुआ आगे बढ़ रहा था। लगभग 10 किलोमीटर जाने के बाद गूगल देवता ने मुझे इस सड़क को भी छोड़ कर एक कच्ची सड़क पर उतरने को कहा। मैं उतर गया। तीन चार किलोमीटर आगे जाने के बाद एक सज्जन से मैंने गांव के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि अभी आपको पक्की सड़क पकड़कर ही तीन-चार किलोमीटर आगे जाना था। मैंने गूगल देवता के सम्मान में दो चार अच्छी अच्छी बातें कहीं और फैसला किया वापस लौटते ही गूगल मैप पर इस गांव का लोकेशन सही करूंगा। वापस पहले वाली सड़क पर आ गया और आगे बढ़ा। चार किलोमीटर आगे जाने के बाद एक बड़ी प्यारी जगह मिली। पूरी ढलान पर पीले पीले फूल खिले थे। ऊपर से नीचे तक पूरा पहाड़ पीला ही दिख रहा था। पता नहीं यह फूल प्राकृतिक थे या किसी ने खेती की थी लेकिन नजारा जबरदस्त था। मैंने सोचा वापसी मैं इस की फोटोग्राफी करूंगा और आगे बढ़ गया। लगभग 1 किलोमीटर और आगे जाने के बाद एक बार फिर मैंने उस गांव के बारे में पूछा और एक बार फिर मुझसे कहा गया कि आप ज्यादा आगे आ गए हैं। दो किलोमीटर पीछे जाइए। वहां से एक सड़क बाईं तरफ ऊपर की ओर जाती हुई मिलेगी उस पर जाना है। मैंने गाड़ी वापस घुमाई और उस फूलों भरी जगह पर आ गया। थोड़ी देर विश्राम किया, दो चार सेल्फीली। कैमरा निकाल कर कुछ फोटो भी खींचे फिर क्रिपा को कॉल किया। उसने मुझसे कहा कि आप वीडियो कॉल करिए तो मैं बता दूंगी आप कहां हैं और किधर जाना है। मैंने वीडियो कॉल भी किया लेकिन उसको कोई आईडिया नहीं मिला। मैंने गाड़ी वापस घुमाई तो थोड़ी दूरी पर सच में एक तिराहा था और एक सड़क ऊपर की तरफ जा रही थी मैंने वह सड़क पकड़ ली और आगे जाने पर क्रिपा की बताई हुई निशानियां जैसे लाल रंग का मंदिर, एक पीले रंग का घर और एक हाई स्कूल नजर आईं। जब हाई स्कूल दिखा तो मैं वहां रुक गया और फिर मैंने फिर क्रिपा को फोन किया और कहा मैं हाई स्कूल पर हूं तो जवाब में मुझे एक बार फिर यही सुनने को मिला कि आप आगे आ गए हैं। दो सौ मीटर पीछे आइए। मेरा घर मंदिर के पास है और मेरे घर के सामने की स्कॉर्पियो खड़ी होगी। राय साहब एक बार फिर वापस मुड़े लेकिन इस बार ठीक ठीक बताए गए घर तक पहुंच गए। घर पर क्रिपा की माताजी मिलीं जो की एक शिक्षिका हैं। उसके भैया भाभी जो कि रंगपो में रहते हैं वह कहीं बाहर गए हुए थे और संजोग से उसके पिताजी भी बाहर ही गए हुए थे। घर पर केवल उसकी माताजी और उसकी छोटी बहन मिले। उनसे काफी सारी बातें हुई और बढ़िया सा लंच हुआ। इसी बीच हमारा मित्र शुशांत सिंह जोकि आजकल सीमा सड़क संगठन में कार्यरत है आजकल सिक्किम में ही पोस्टेड है। मैं सुबह से ही उसको कॉल लगाने की कोशिश कर रहा था और कॉल नहीं लग रही थी उसे कॉल लग गई और उसने रात्रि विश्राम के लिए उन्होंने अपने यहां आमंत्रित किया। वह एनएचपीसी के कैंप कॉलोनी में रहता है। रांगपो से सिंगथाम अठारह किलोमीटर है और सिंगथाम से एनएचपीसी की कॉलोनी लगभग 7 किलोमीटर है। मैं वापस रंगपो आया और सिंगथाम का रास्ता पकड़ लिया। पूछते पूछते मैं कॉलोनी तक तो पहुंच गया लेकिन आज सुबह से जैसा कि हर बार होता आया था, जहां से मुझे सड़क छोड़नी थी उससे लगभग दो किलोमीटर आगे बढ़ गया फिर शुशांत को फोन लगाया। उसने वापस आने को कहा। मैं वापस आया तो कॉलोनी के गेट पर शुशांत अपनी कार के साथ खड़ा था। मैं उसके साथ उसके घर पहुंचा। घर पर उसकी पत्नी और बेटी से मुलाकात हुई। अभी सूरज डूब ही रहा था और मैं अपने लक्ष्य तक पहुंच चुका था। आज मैं मात्र 120 किलोमीटर की यात्रा किया था। शुशांत के घर पर शाम अच्छी व्यतीत हुई हम लोग बैठ के काफी देर तक बातें करते रहे। रात को खाने में देसी मुर्गे की मोटी सी टांग थी। पूरे पूर्वोत्तर में जहां भी मुझे मुर्गे की टांग मिली जंबो साइज ही मिली। पता नहीं क्यों दिल्ली वाले ऐसी टांग वाले मुर्गे क्यों नहीं बेचते। आज के लिए सिर्फ इतना ही ।
जै जै
सिलिगुड़ी से प्रस्थान

तीस्ता




फूलों की घाटी




कृपा के घर

रंबी बाजार में नाश्ता

तीस्ता पुल पर

कृपा के घर शानदार लंच





बुधवार, 19 दिसंबर 2018

दो पहियों पर पूर्वोत्तर : दूसरा पड़ाव : सिलीगुड़ी

24 नवंबर शनिवार
दरभंगा

सुबह सुबह छह बजे नींद खुल गई। लेकिन इतनी सुबह मेरा निकलने का कोई इरादा नहीं था। मोटरसाइकिल की नंबर प्लेट पर आधे नंबर थे और आधे नहीं थे। मैं दरभंगा में कम से कम अपनी नंबर प्लेट तो ठीक करा ही लेना चाहता था। इसलिए सुबह सुबह निकल कर बाहर टहलने लगा। सामने ही घंटाघर था और अधिकांश शहरों की तरह घंटाघर की घड़ी खराब थी। बगल में ही दातुन बिक रहे थे और नीम का दातुन तो मेरा फेवरेट है। ₹1 का एक दातुन लिया और दांत रगड़ते हुए शहर में टहलने लगा। सुबह सुबह सड़कों पर या तो खिलाड़ी दिखते हैं या छात्र। लगभग सारी दुकानें बंद थीं। आराम से टहलता हुआ हुआ दातुन करता रहा। कुछ देर टहलने के बाद छोले भटूरे की दुकान दिखी। मैं ठहरा चटोरा आदमी। तुरंत वहां पर दातुन खत्म किया, कुल्ला किया और भटूरे का आर्डर फारमा दिया। मैंने छोले भटूरे बहुत जगह खाए हैं लेकिन सड़क के किनारे कड़ाही से निकलते गरमा गरम छोले भटूरे खाने का आनंद ही कुछ और है। दनादन 4 छोले भटूरे दबा दिए। उसके बाद एक प्लेट चावल भी मार दिया। फिर भी शरीर भारी नहीं लग रहा था। आराम से होटल में आया, थोड़ी देर विश्राम किया और वहां से चेक-आउट कर लिया। मैं अगल-बगल की दुकानें देखता हुआ मंथर गति से मैं आगे बढ़ रहा था। थोड़ी देर बाद मुझे नंबर प्लेट बनाने की दुकानें दिखने लगीं लेकिन सारी बंद थीं। थोड़ा आगे जाने पर एक सज्जन दुकान खोलते हुए नजर आए। मैंने वहां जाकर अपनी मोटरसाइकिल खड़ी कर दी और भाव ताव करना शुरू कर दिया। मूल्य पर सहमति होने के बाद उन्होंने अपना काम शुरू कर दिया। बातों ही बातों में जब उनको पता चला कि मैं देवरिया से आ रहा हूँ और लक्ष्य डिब्रूगढ़ है तो बड़े प्रसन्न हुए और चाय पानी के लिए पूछने लगे। दुकान के पिछले हिस्से में ही उनका घर भी था। मेरे यह कहने पर कि मैं चाय नहीं पीता उन्होंने घर से नाश्ता मंगवा दिया। नाश्ते में कच्चे कटे हुए पपीते और अंकुरित मूंग थी। हलांकि स्वास्थ्य की दृष्टि से यह बहुत ही उत्तम नाश्ता है लेकिन यह दोनों ही चीजें मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। फिर भी कोई इतने प्रेम से और इतना मनुहार करके खिलाए तो कोई ना कैसे कर सकता है। मुझे पपीते और मूंग भी बहुत स्वादिष्ट लगे। मोटरसाइकिल के वाइजर पर काफी स्क्रैच थे इसलिए मैंने सोचा कि इस पर कुछ लिखवा लेने पर सारे स्क्रैच उसके पीछे छुप जाएंगे। इसलिए मैंने उस पर चरैवेति चरैवेति लिखवाने का फैसला किया। उस सज्जन ने बिना कुछ अतिरिक्त पैसे लिए यह काम कर दिया। ज्यादा बातचीत करने पर पता चला कि उनका नाम सुशील मेहता है और उनके पूर्वज विभाजन के समय पाकिस्तान से यहां आए थे। विभाजन के समय पाकिस्तान से आए लोगों की एक खास बात देखता हूँ कि सभी लोग धंधा करने वाले ही होते हैं। बहुत कम लोग नौकरी पेशा मिलते हैं। और धंधे मे ये लोग बहुत सफल होते हैं। मुझे लगता है कि उस जमाने में लाहौर हिंदू व्यापारियों का गढ़ था और विभाजन के कारण उनको जल्दबाजी में सब छोड़ कर आना पड़ा। उनसे विदा लेकर मैं आगे बढ़ा और ललित नारायण विश्वविद्यालय दरभंगा जहां से मेरी माता जी ने पढ़ाई की है, को पार करते हुए आगे बढ़ा। रेलवे क्रॉसिंग बंद होने के कारण मुझे रुकना पड़ा। सामने बिहार संपर्क क्रांति की शंटिंग हो रही थी। काफी देर तक पकाने के बाद फाटक खुला। एक रेलवे लाइन पार करके दूसरी लाइन के किनारे किनारे आगे जाने पर मैं एक बार फिर नेशनल हाईवे 27 पर पहुंच गया। दरभंगा से फारबिसगंज 162 किलोमीटर दूर है। मैंने अंदाजा लगाया कि दो-तीन घंटे में पहुंच जाऊंगा और वहां पर गाड़ी का इंश्योरेंस तो कम से कम करवा ही लूंगा। और अपरिचित जगह पर मैं इंश्योरेंस एजेंट कहां ढूंढता, इसलिए मैंने फैसला किया कि मैं सीधा आई सी आई सी आई बैंक में चला जाऊंगा। थोड़ा आगे जाने पर  कोसी नदी के दर्शन हुए। वह नदी जिस को बिहार का शोक कहा जाता है। हर साल भयंकर तबाही मचाती है। बहुत लोगों को बर्बाद करती है तो बहुतों को मालामाल भी कर जाती है। शायद इसीलिए सरकारी विभाग इसकी कोई  परमानेंट व्यवस्था नहीं करते। लेकिन यही कोसी वर्षा के मौसम के बाद जब जमीन छोड़ती है तो वह जमीन जबरदस्त उपजाऊ होती है। बिना किसी सिंचाई या खाद के उस में जबरदस्त फसल होती है। हर साल बाढ़ के बाद यह नदी अपना रास्ता बदल लेती है। अब तो यहां के निवासी भी के कोसी साथ जीना सीख गए है। उसके बाद एक मजेदार घटना हुई। मैंने देखा सड़क के किनारे किसानों ने पटसन सूखने के लिए फैला रखा था। एक जगह ट्रक खड़ा करने के लिए अतिरिक्त चौड़ी सड़क बनाई गई थी और उस पूरी सड़क पर किसानों ने पटसन सूखने के लिए फैला रखा था। एक किसान वहां पर काम कर रहा था। काम क्या कर रहा था बस सब उलट-पुलट रहा था कि ठीक से सूख जाए। मैं रुका और उस दृश्य की फोटो लेने की कोशिश की लेकिन किसान ने समझा कि मैं कोई सरकारी अधिकारी हूँ। उसके सड़क पर जूट फैलाने की वजह से नाराज हूँ इसलिए तस्वीर खींचकर उसके ऊपर कारवाई करने के लिए भेजने वाला हूँ। उसने माफी मांगना शुरू कर दिया। पहले तो उसने कहा कि जूट उसका नहीं है किसी और का है। उसके बाद कहने लगा दोबारा वह जूट सड़क पर नहीं फैलाएगा। उसके बाद हाथ जोड़ने लगा, पैर पड़ने लगा। उसके बाद जूट से भरी हुई एक बैलगाड़ी आई तो उसने बैलगाड़ी को डर के मारे दूर से ही वापस भेज दिया। फिर कुछ स्थानिय लौंडे वहां से गुजर रहे थे। मैंने उनको पकड़ा तो वह किसान को समझा सके कि मैं सरकारी कर्मचारी नहीं हूँ और फोटो सिर्फ मनोरंजन के लिए खींच रहा हूँ। तब जाकर वह किसान फोटो खिंचाने को तैयार हुआ। करीब साढ़े ग्यारह बजे मैं फारबिसगंज पहुंचा। वहां जाकर पता चला कि इस कस्बे में आईसीआईसीआई या एचडीएफसी बैंक की कोई ब्रांच नहीं है। मेरा तो मूड ही खराब हो गया और मैंने हाईवे से उतरने की भी जहमत नहीं उठाई और सीधा आगे बढ़ गया। फारबिसगंज से लगभग 30 किलोमीटर दूर अररिया है जोकि जिला मुख्यालय है। इसलिए वहां पर तो बैंक जरूर था। लेकिन पहुंचने पर उसका दरवाजा बंद मिला। कारण कार्तिक पूर्णिमा की छुट्टी। मैंने अपना सर पीट लिया क्योंकि आज शनिवार था और कल रविवार की छुट्टी रहेगी। अब परसों ही कुछ हो पाएगा, और बीच में अगर किसी पुलिस वाले ने थाम लिया तो कल्याण ही हो जाएगा। जब मैं परेशान होता हूं तुम्हें एक ही काम करता हूं और वह है बढ़िया खाना। सड़क पर एक विजय होटल लिखी दुकान देखी और उसमें घुस गया और सीधा हाफ प्लेट मटन का ऑर्डर दे दिया। उसने पूछा कौन सा पीस दूं तो मेरे मुंह से अनायास निकल गया कि चुस्ता दे दो। और भाग्य कि उसके पास चुस्ता था भी। फिर बड़ा दिल लगाकर मैंने खाना खाया। खाने के बाद मूड बिल्कुल फिट हो गया था। किंतु जब मैं बिल पे कर रहा था तब मैं थोड़ा निराश हो गया क्योंकि उसके पास कम से कम 10 तरह की मछलियां थीं। देसी मांगुर, सिंही, रोहू, कतला इत्यादि। अगर मुझे पहले पता होता तो मैं मटन के बजाय मछली को ही वरीयता देता। खैर खाना फिर कभी। मैं मोटरसाइकिल पर बैठ ही रहा था कि सड़क के दूसरी तरफ सहज सेवा केंद्र लिखा बोर्ड दिखाई दिया। मैं मोटरसाइकिल से उतरा और दुकान में घुसा और उससे इंश्योरेंस के बारे में पता किया। उसने लैपटॉप खोला और आधे घंटे में इंश्योरेंस मेरे हाथ में था। मुझे बहुत राहत मिली। मोटरसाइकिल पर बैठा और गूगल देवता को सिलीगुड़ी का रास्ता बताने का निर्देश देकर गाड़ी आगे बढ़ाई। यह राहत क्षणिक थी। क्योंकि तीन-चार किलोमीटर आगे जाते ही गूगल देवता मुझसे फोरलेन हाईवे छोड़ कर दो लेन की सड़क पर मुड़ने को कहने लगे। मैंने रुक कर जांच पड़ताल की तो पता चला यदि मैं चार लेन सड़क यानी नेशनल हाईवे नंबर 27 पकड़ता हूं तो मुझे करीब 50 किलोमीटर ज्यादा चलना पड़ेगा और मजा भी नहीं आएगा। और अगर मैं यह छोटा रास्ता पकड़ता हूँ तो तकलीफ तो होगी लेकिन रास्ते का आनंद भी आएगा। मैंने गूगल देवता का निर्देश मानते हुए छोटे रास्ते पर ही आगे बढ़ने का फैसला किया। पहले यह सड़क स्टेट हाईवे नंबर 63 हुआ करती थी। लेकिन अब इसको केंद्र सरकार ने अपने पास ले लिया है और उसको नया नंबर दिया है। नेशनल हाईवे 327। अब चूंकि यह सड़क नेशनल हाईवे बन गई है इसलिए इस पर जोर शोर से काम चल रहा है। इस कारण से मुझे चलने में तो परेशानी हुई लेकिन छोटे-छोटे कस्बों के बीच से नदी नाले पार करते हुए निकलने में आनंद आ गया। छोटे-छोटे ग्रामीण बाजार, खेतों में काम करते हुए लोग, स्कूल से लौटते हुए बच्चे और सबसे मजेदार छोटे-छोटे गड्ढों में मछली पकड़ते हुए बच्चे। बहादुरगंज-ठाकुरगंज  होते हुए  गलगलिया जोकि बंगाल बंगाल और बिहार का बॉर्डर है, पहुंचते पहुंचते अंधेरा होने लगा। अंधेरा होने पर मैं रुका, अपनी जैकेट पहनी, हेलमेट का शीशा ऊपर किया और प्लेन चश्मा लगा लिया। लेकिन मैंने पिछले दिन चश्मे को पाना के साथ रख दिया था इसलिए चश्मे की एक आंख पर स्क्रैच आ गए थे और इस वजह से मुझे स्पष्ट नहीं दिख रहा था। एक तो रात का समय ऊपर से दो लेन की सड़क। जब सामने से कोई वाहन आता तो उसकी लाइटों की चकाचौंध मुझे लगभग अंधी कर देती इसलिए मैं आराम से लगभग 40 की स्पीड से चल रहा था। फिर थोड़ी देर में अचानक मेरे ज्ञान चक्षु खुले और समझ में आया कि जब 40 की स्पीड से ही चलना है तो चश्मे की क्या आवश्यकता है। मैंने चश्मा उतार कर जेब में रखा और आराम से आगे बढ़ा। बंगाल में जहां जहां नेशनल हाईवे खराब था वहां पर राज्य सरकार ने बोर्ड लगा दिया था “दिस रोड इस प्रॉपर्टी ऑफ नेशनल हाईवे” ताकि यात्री समझ जाए कि उसको जो तकलीफ हो रही है वह राज्य सरकार नहीं बल्कि केंद्र सरकार दे रही है। खैर एक दो शॉर्टकट और लिए और साढ़े छह बजे तक बागडोगरा पहुंच गया। कभी बागडोगरा सिक्किम पहुंचने के लिए नजदीकी एयरपोर्ट हुआ करता था। लेकिन अब सिक्किम के पास अपना एयरपोर्ट है। सिलीगुड़ी से पहले  सड़क बाला सोन नदी को क्रॉस करती है। मैं नदी के पहले एक फास्ट फूड वाले की दुकान पर रुका। नियत शरीर को थोड़ा आराम देने की और लगे हाथों कुछ नाश्ता करने की थी। दुकान में उपलब्ध विकल्पों में मुझे फ्राइड चिकन लेग ही सबसे बढ़िया विकल्प लगा और जब दुकान वाले ने वह मुझे दिया तो मैं मुर्गे की टांग का साइज देखकर चौक गया। कम से कम अपनी तरफ या दिल्ली में मैंने कभी किसी रेस्टोरेंट में इतना बड़ा लेग पीस नहीं खाया। मैंने बड़ी तसल्ली से बैठकर उसको निबटाया और हाथ पैर सीधा करके आगे बढ़ा। मुझे पता भी नहीं चला कि मैं कब बागडोगरा से सिलीगुड़ी में प्रवेश कर गया। शहर के अंदर जबरदस्त ट्रैफिक था। मैं चलता रहा और जल्दी ही सिलीगुड़ी स्टेशन के पास पहुंच गया। वहां पर एक होटल में कमरा लिया, सामान रखा, और हाथ मुंह धोकर टहलते हुए बाहर निकला। आज लगभग 370 किलोमीटर गाड़ी चला चुका था और पीठ में भयंकर दर्द हो रहा था। ऐसे ही टहलते हुए एक नाई की दुकान नजर आई और मैं जाकर उसमें दाढ़ी बनवाने बैठ गया। नाई ने बड़े प्रेम से दाढ़ी बनाया। फिर फेशियल के लिए पूछा। मैंने कहा भाई फेशियल तो मैं नहीं कराता अगर तुझे तेल लगाकर मालिश करने आती है तो वह कर दे और नाई मेरे पर भिड़ गया। पंद्रह मिनट के बाद जब मैं वहां से अपनी मरम्मत करवाकर निकला तो मिजाज काफी फ्रेश हो चुका था। मुझे अपने लिए कुछ कपड़ों की जरूरत थी इसलिए पूछते पूछते वहां के कपड़ों के बाजार में पहुंचा। मुझे कपड़े खरीदने का कोई खास एक्सपीरियंस नहीं है इसलिए समझ में नहीं आ रहा था मैं कहां से खरीदूं और क्या खरीदूं। फिर भी चूंकि खरीदना आवश्यक था इसलिए सस्ता महंगा जैसा भी हुआ एक जोड़ी गर्म कपड़ा खरीद लिया। खाने के लिए एक बंगाली होटल दिखा तो मैं उसमें घुस गया। उसके पास बरारी मछली थी लेकिन रोटी नहीं थी। मैंने चावल से ही काम चला लिया क्योंकि मछली बहुत बढ़िया थी। फिर वापस होटल में आया और थकान के मारे कब नींद आ गई पता भी नहीं चला।

जै जै

कैप्शन की जरूरत है क्या




प्यार से परोसा गया नाश्ता


चुस्ता रोटी





चरैवेति चरैवेति

कोसी का प्रवाह


कोसी के तटबंध पर बसावट
सड़क पर सूखता पटसन (जूट)
जूट से लदी गाड़ी




अब रास्ते के दृष्य....
रास्ते में कहीं
खइनी नहीं छूटनी चाहिए.......







कोसी पुल पर

बरारी - भात इन सिलीगुड़ी




सोमवार, 17 दिसंबर 2018

दो पहियों पर पूर्वोत्तर : पहला पड़ाव : दरभंगा


23 नवंबर 2018, शुक्रवार


पिछले तीन महीने से सिर्फ योजना ही बन रही थी और योजना के हिसाब से आज मुझे नेशनल हाईवे पर होना था और अगले दिन अल सुबह नेपाल के लिए निकल लेना था। लेकिन अगर योजना के हिसाब से सब कुछ होता तो रावण की तो योजना स्वर्ग तक सीढ़ी बनाने की थी। अर्थात मैं अभी भी घर पर था, मेरी मोटरसाइकिल की चाबी दिल्ली में थी, मोटरसाइकिल में तेल पता नहीं कितना था और न ही इंश्योरेंस था न प्रदूषण सर्टिफिकेट। इसके अलावा दिल्ली से लाए हुए दोनो ट्यूबलेस टायर भी लगाने बाकी थे। अर्थात इस बात की भरपूर संभावना थी कि निकलते निकलते आज शाम हो जाए। खैर सुबह सुबह अपने पड़ोस में रहने वाले मकैनिक रामदुलार को बुलाकर गाड़ी को बिना चाबी के स्टार्ट करने की व्यवस्था बनाई। उसका दावा था कि घर से आठ किलोमीटर दूर भिंगारी बाजार नाम की जगह पर चाबी बन जाएगी। खैर मोटरसाइकिल और टायर लेकर मैं घाँटी पहुंचा और गाड़ी मकैनिक के हवाले कर दी ताकि वह पुराने टायरों को उतारकर नए ट्यूबलेस टायर लगा दे। अगला टायर तो तुरंत लग गया लेकिन पिछला टायर लेकर मैकेनिक 1 घंटे तक जूझता रहा उसके बाद उसने हाथ खड़े कर दिए की टायर ही ठीक नहीं है। मैंने मोटरसाइकिल उठाई और वापस घर पहुंचा। चलते चलते मेरे मित्र व मकैनिक रामदुलार ने स्पार्क प्लग को खोलने के लिए पाना और एक अतिरिक्त स्पार्क प्लग दे दिया ताकि रास्ते में काम आए। मैं अपना सारा तामझाम लेकर वहां से निकला और भिंगारी बाजार पहुंचा और वहां पहुंचते हैं मेरी पुरानी यादें ताजा हो गईं। मैंने चौथी कक्षा से लेकर सातवीं कक्षा तक भिंगारी बाजार में ही स्थित  लिटिल फ्लावर अकैडमी के हॉस्टल में रह कर पढ़ाई की है। किंतु अफसोस मेरे मित्रों में से सिर्फ एक भिंगारी बाजार में है और दुर्भाग्य से वह भी नहीं मिला। खैर पूछते पूछते मैं चाबी बनाने वाले की दुकान पर पहुंचा। उसने गाड़ी देखते ही इनकार कर दिया और कहा कि वह होंडा गाड़ी की चाबी नहीं बना सकता। एक दूसरी दुकान जहां चाबी बन सकती थी वह बंद थी। वहां कहा गया की चाबी भोरे में बन जाएगी जो कि बिहार में स्थित एक कस्बा है और भिनगारी से उसकी दूरी लगभग दस किलोमीटर है। गाड़ी अभी भी रिजर्व में नहीं आई थी इसलिए कोई विशेष चिंता नहीं थी। लेकिन जब भोरे में भी चाबी नहीं बनी और मुझे गोपालगंज जाने की सलाह दी गई तब मेरा चिंतित होना लाजमी था। क्योंकि भोरे से गोपालगंज की दूरी लगभग चालिस किलोमीटर है। जैसे तैसे मैं थावे पहुंचा। थावे से गोपालगंज मात्र छह किलोमीटर रह जाता है। मैंने थावे का जिक्र इसलिए किया क्योंकि हमारी तरफ थावे एक बहुत ही लोकप्रिय तीर्थस्थल है। बच्चों का मुंडन कराने से लेकर  नई गाड़ी खरीदने पर उसकी पूजा कराना सारे काम हमारी तरफ के लोग यही कराते हैं। इसके पीछे भी एक बड़ी दिलचस्प कथा है। कहते हैं यहां का जो राजा था  मनन सिंह  वह भवानी का बहुत बड़ा भक्त था और उसे इस बात का अहंकार था  कि उससे बड़ा भक्त कोई नहीं है। एक बार उसके राज्य में अकाल पड़ा  और लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए।  राजा के महल से थोड़ी ही दूर  रहसू भगत रहता था। वह रोज दिन में घास काटता था और रात को  उस घास की  मड़ाई करने के लिए जंगल से शेर आ जाते थे।  बैलों के बजाय  शेरों को बांधकर  उनसे वह घास की मड़ाई करता था और उसमें से अनाज निकलता था। उस अनाज से  वह आस-पास के लोगों को भोजन कराता था। यह बात फैलते फैलते राजा के पास पहुंची। राजा वहां पर पहुंचा  और उसने पूछा कि यह अनाज तुम्हारे पास कहां से आया। उत्तर में रहसू ने कह दिया यह सब माता की कृपा से ही आता है। राजा को यह विश्वास नहीं हुआ कि उस के घर के पास में ही  कोई उससे भी बड़ा भक्त हो सकता है। इसलिए उसने रहसू को ढोंगी कहा  और उसे भवानी को बुलाने का आदेश दिया। उसने राजा से प्रार्थना की  कि ऐसा करने से  भवानी कुपित हो जाएगी  और सब कुछ बर्बाद कर देंगी। लेकिन राजा अपनी जिद पर अड़ा रहा।  फिर रहसू ने  देवी को  कामाख्या से बुलाया। आते हुए देवी  कोलकाता और छपरा में रुकीं और वहां पर आज भी सिद्ध पीठ है। उसके पश्चात  देवी ने  रहसू का सिर फाड़ कर  स्वयं को प्रकट किया। राजा की भी वही मृत्यु हो गई और उसका भवन महल  भी गिर गया। इस प्रकार वहां मंदिर की स्थापना हुई। आज भी लोग पहले देवी का दर्शन करने के पश्चात रहसू भगत के आश्रम में जाकर  उनका दर्शन अवश्य करते हैं। यह मंदिर हथुवा के राजा की संपत्ति है जो कि आम जनता के लिए खुला हुआ है। गोपालगंज मैं शहर के अंदर ट्रैफिक से जूझता हुआ चाबी बनाने वाले के पास पहुंचा। तब तक दोपहर के लगभग एक बज चुके थे और मैं घर से करीब साठ किलोमीटर ही यात्रा कर सका था। खैर वहां पर चाबी बन गई और वहां से मैं हाईवे की तरफ बढ़ा। नेशनल हाईवे नंबर सत्ताइस गोपालगंज से होकर निकलता है। मुझे भी उसी हाईवे से होकर आगे बढ़ना था। हाईवे के नजदीक मुझे एक टायर रिपेयर की दुकान दिखी। मैंने गाड़ी खड़ी की और रिपेयर वाले से ट्यूबलेस टायर लगाने को कहा और स्वयं बगल में ही एक ढाबे में खाना खाने चला गया। वहां पर रोटी और मटन का ऑर्डर दिया। दुकान पर भीड़ अच्छी खासी थी और बंदे थे सिर्फ दो। और वो भी बात बात पर ग्राहकों पर भड़क रहे थे। लेकिन फिर भी भीड़ कम नहीं हो रही थी। और क्यों कम नहीं हो रही थी यह मुझे खाना खाते समय पता चला। क्या शानदार मटन बनाया था उन्होंने। आनंद आ गया। खाने के बाद बिल चुका कर मैं वापस टायर वाले के पास आया तो उसने मुझे स्पष्ट रूप से बता दिया कि यह टायर सेट नहीं हो सकता इसमें कोई मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट है। अब मैं क्या करता पुराना टायर बुरी तरह से घिस चुका था। तो उसी ने एक आईडिया दिया और कहा की पुरानी ट्यूब को ही नए ट्यूबलेस टायर में लगवा लीजिए तो किनारों से हवा की लीकेज बंद हो जाएगी और आपको ट्यूबलेस टायर की शक्ति भी मिल जाएगी। मरता क्या न करता। मेरे पास कोई दूसरा ऑप्शन तो था नहीं। तो मैंने यही किया उसके बाद गाड़ी स्टार्ट की हाईवे किनारे पेट्रोल लिया और गाड़ी को भगा लिया। हाईवे पकड़ते पकड़ते लगभग ढाई बज चुके थे। अब मेरा लक्ष्य था मुजफ्फरपुर, क्योंकि मुझे लगा कि इसके आगे मैं आज नहीं जा सकता। गोपालगंज से लगभग 50 किलोमीटर के बाद हाईवे गंडक नदी को पार करता है। थोड़ी देर आराम करने के लिए मैं पुल पर रुका, कुछ फोटोग्राफी की, और फिर मोटरसाइकिल पर सवार हो गया। आगे पिपराकोठी नाम की जगह पर नेशनल हाईवे 527 डी आकर नेशनल हाईवे 27 में मिल जाता है। यह मार्ग एशियन हाईवे 42 कहलाता है। नेशनल हाईवे 42 चीन के लांझू नामक जगह से नेपाल होते हुए बिहार के नवादा के पास बाढ़ी नामक जगह तक जाता है। तो यहां से मुजफ्फरपुर तक हम एशियन हाईवे संख्या 42 पर थे। मुजफ्फरपुर पहुंचते पहुंचते शाम के छह बज गए थे। नवंबर का महीना होने के कारण हम इसे रात के छह भी कह सकते हैं क्योंकि अंधेरा हो चुका था और लाइट्स जल चुकी थी। क्योंकि अभी छह बज रहे थे इसलिए मैंने और आगे जाने का फैसला किया और लक्ष्य दरभंगा को रखा। मुजफ्फरपुर से एशियन हाईवे 42 को छोड़कर नेशनल हाईवे संख्या 27 पर ही आगे बढ़ जाने पर मैं दरभंगा की तरफ बढ़ गया। मुजफ्फरपुर से दरभंगा करीब 75 किलोमीटर दूर है इसलिए मुझे भी कोई जल्दी नहीं थी और मैं आराम से जा रहा था। रास्ते में एक ढाबा देखकर रुका। ढाबे में कोई ग्राहक नहीं था। बस 2-3 कर्मचारी थे जो रात के खाने की तैयारी कर रहे थे। मैंने पूछा नाश्ते में क्या मिल सकता है तो सीधा जवाब मिला घुघुनी या पनीर पकोड़ा। यानी या तो धुर बिहारी नाश्ता या फिर दिल्ली वाला। मुझे बिहारी खाना बहुत पसंद है लेकिन घुघुनी बिल्कुल पसंद नहीं है। इसलिए मैंने पनीर पकौड़ा का ऑर्डर दे दिया। वहां बैठकर मैंने बड़े मजे से पनीर पकोड़े खाए और एक बार फिर मोटरसाइकिल पर बैठ कर आगे बढ़ गया। हाईवे पर सीधे चलते चले जाएं तो रेलवे लाइन पार करने के बाद एक चौराहा आता है। उस चौराहे से दाहिने मुड़ जाने पर अप दरभंगा शहर में प्रवेश कर जाते हैं। लेकिन गूगल बाबा की जय हो। उन्होंने उस चौराहे से करीब 10 किलोमीटर पहले ही मुझे दाहिनी तरफ मोड़ दिया और सिंगल लेन की सुनसान सड़क पर  दौड़ा दिया। और सड़क भी ऐसी सुनसान कि न कोई इंसान दिखे ना कोई घर दिखे ना कोई दुकान दिखे। बीच-बीच में एकाध ट्रक वाले सामने से आ जाते। ऐसे ही समय में सबसे ज्यादा भगवान की याद आती है। जैसे तैसे मैं दरभंगा पहुंचा। फिर गूगल महाराज ने दरभंगा के सारे गली कूचे घुमा कर एक गंदे से मोहल्ले में यह कह कर खड़ा कर दिया लो भाई साहब यही दरभंगा है। मैंने कहा रहने दो गूगल महाराज आप केवल नक्शा दिखाओ जाना कहां है वह मैं तय करूंगा। उसके बाद मैंने नक्शे में मेन मार्केट खोजा और उसकी तरफ चलता हुआ मैं हाजमा चौक पहुंचा। अभी लगभग 8 ही बज रहे थे इसलिए पूरा शहर जगा हुआ था और मार्केट में चहल पहल थी। मैं लहरिया सराय टावर चौक के पास एक होटल में कमरा लिया, हाथ मुंह धो कर बाजार में खाना खाने निकला। चिकन लॉलीपॉप और रोटी खाया और आकर चैन से सो गया। जै जै
तैयारी पूरी



चाबी बनते हुए

गोपालगंज से आगे बढ़ने को तइयार

पनीर पकौड़े

गंडक पुल पर




गंडक पुल पर