23 नवंबर 2018, शुक्रवार
पिछले तीन महीने से सिर्फ योजना ही बन रही थी और योजना के हिसाब से आज मुझे नेशनल हाईवे पर होना था और अगले दिन अल सुबह नेपाल के लिए निकल लेना था। लेकिन अगर योजना के हिसाब से सब कुछ होता तो रावण की तो योजना स्वर्ग तक सीढ़ी बनाने की थी। अर्थात मैं अभी भी घर पर था, मेरी मोटरसाइकिल की चाबी दिल्ली में थी, मोटरसाइकिल में तेल पता नहीं कितना था और न ही इंश्योरेंस था न प्रदूषण सर्टिफिकेट। इसके अलावा दिल्ली से लाए हुए दोनो ट्यूबलेस टायर भी लगाने बाकी थे। अर्थात इस बात की भरपूर संभावना थी कि निकलते निकलते आज शाम हो जाए। खैर सुबह सुबह अपने पड़ोस में रहने वाले मकैनिक रामदुलार को बुलाकर गाड़ी को बिना चाबी के स्टार्ट करने की व्यवस्था बनाई। उसका दावा था कि घर से आठ किलोमीटर दूर भिंगारी बाजार नाम की जगह पर चाबी बन जाएगी। खैर मोटरसाइकिल और टायर लेकर मैं घाँटी पहुंचा और गाड़ी मकैनिक के हवाले कर दी ताकि वह पुराने टायरों को उतारकर नए ट्यूबलेस टायर लगा दे। अगला टायर तो तुरंत लग गया लेकिन पिछला टायर लेकर मैकेनिक 1 घंटे तक जूझता रहा उसके बाद उसने हाथ खड़े कर दिए की टायर ही ठीक नहीं है। मैंने मोटरसाइकिल उठाई और वापस घर पहुंचा। चलते चलते मेरे मित्र व मकैनिक रामदुलार ने स्पार्क प्लग को खोलने के लिए पाना और एक अतिरिक्त स्पार्क प्लग दे दिया ताकि रास्ते में काम आए। मैं अपना सारा तामझाम लेकर वहां से निकला और भिंगारी बाजार पहुंचा और वहां पहुंचते हैं मेरी पुरानी यादें ताजा हो गईं। मैंने चौथी कक्षा से लेकर सातवीं कक्षा तक भिंगारी बाजार में ही स्थित लिटिल फ्लावर अकैडमी के हॉस्टल में रह कर पढ़ाई की है। किंतु अफसोस मेरे मित्रों में से सिर्फ एक भिंगारी बाजार में है और दुर्भाग्य से वह भी नहीं मिला। खैर पूछते पूछते मैं चाबी बनाने वाले की दुकान पर पहुंचा। उसने गाड़ी देखते ही इनकार कर दिया और कहा कि वह होंडा गाड़ी की चाबी नहीं बना सकता। एक दूसरी दुकान जहां चाबी बन सकती थी वह बंद थी। वहां कहा गया की चाबी भोरे में बन जाएगी जो कि बिहार में स्थित एक कस्बा है और भिनगारी से उसकी दूरी लगभग दस किलोमीटर है। गाड़ी अभी भी रिजर्व में नहीं आई थी इसलिए कोई विशेष चिंता नहीं थी। लेकिन जब भोरे में भी चाबी नहीं बनी और मुझे गोपालगंज जाने की सलाह दी गई तब मेरा चिंतित होना लाजमी था। क्योंकि भोरे से गोपालगंज की दूरी लगभग चालिस किलोमीटर है। जैसे तैसे मैं थावे पहुंचा। थावे से गोपालगंज मात्र छह किलोमीटर रह जाता है। मैंने थावे का जिक्र इसलिए किया क्योंकि हमारी तरफ थावे एक बहुत ही लोकप्रिय तीर्थस्थल है। बच्चों का मुंडन कराने से लेकर नई गाड़ी खरीदने पर उसकी पूजा कराना सारे काम हमारी तरफ के लोग यही कराते हैं। इसके पीछे भी एक बड़ी दिलचस्प कथा है। कहते हैं यहां का जो राजा था मनन सिंह वह भवानी का बहुत बड़ा भक्त था और उसे इस बात का अहंकार था कि उससे बड़ा भक्त कोई नहीं है। एक बार उसके राज्य में अकाल पड़ा और लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए। राजा के महल से थोड़ी ही दूर रहसू भगत रहता था। वह रोज दिन में घास काटता था और रात को उस घास की मड़ाई करने के लिए जंगल से शेर आ जाते थे। बैलों के बजाय शेरों को बांधकर उनसे वह घास की मड़ाई करता था और उसमें से अनाज निकलता था। उस अनाज से वह आस-पास के लोगों को भोजन कराता था। यह बात फैलते फैलते राजा के पास पहुंची। राजा वहां पर पहुंचा और उसने पूछा कि यह अनाज तुम्हारे पास कहां से आया। उत्तर में रहसू ने कह दिया यह सब माता की कृपा से ही आता है। राजा को यह विश्वास नहीं हुआ कि उस के घर के पास में ही कोई उससे भी बड़ा भक्त हो सकता है। इसलिए उसने रहसू को ढोंगी कहा और उसे भवानी को बुलाने का आदेश दिया। उसने राजा से प्रार्थना की कि ऐसा करने से भवानी कुपित हो जाएगी और सब कुछ बर्बाद कर देंगी। लेकिन राजा अपनी जिद पर अड़ा रहा। फिर रहसू ने देवी को कामाख्या से बुलाया। आते हुए देवी कोलकाता और छपरा में रुकीं और वहां पर आज भी सिद्ध पीठ है। उसके पश्चात देवी ने रहसू का सिर फाड़ कर स्वयं को प्रकट किया। राजा की भी वही मृत्यु हो गई और उसका भवन महल भी गिर गया। इस प्रकार वहां मंदिर की स्थापना हुई। आज भी लोग पहले देवी का दर्शन करने के पश्चात रहसू भगत के आश्रम में जाकर उनका दर्शन अवश्य करते हैं। यह मंदिर हथुवा के राजा की संपत्ति है जो कि आम जनता के लिए खुला हुआ है। गोपालगंज मैं शहर के अंदर ट्रैफिक से जूझता हुआ चाबी बनाने वाले के पास पहुंचा। तब तक दोपहर के लगभग एक बज चुके थे और मैं घर से करीब साठ किलोमीटर ही यात्रा कर सका था। खैर वहां पर चाबी बन गई और वहां से मैं हाईवे की तरफ बढ़ा। नेशनल हाईवे नंबर सत्ताइस गोपालगंज से होकर निकलता है। मुझे भी उसी हाईवे से होकर आगे बढ़ना था। हाईवे के नजदीक मुझे एक टायर रिपेयर की दुकान दिखी। मैंने गाड़ी खड़ी की और रिपेयर वाले से ट्यूबलेस टायर लगाने को कहा और स्वयं बगल में ही एक ढाबे में खाना खाने चला गया। वहां पर रोटी और मटन का ऑर्डर दिया। दुकान पर भीड़ अच्छी खासी थी और बंदे थे सिर्फ दो। और वो भी बात बात पर ग्राहकों पर भड़क रहे थे। लेकिन फिर भी भीड़ कम नहीं हो रही थी। और क्यों कम नहीं हो रही थी यह मुझे खाना खाते समय पता चला। क्या शानदार मटन बनाया था उन्होंने। आनंद आ गया। खाने के बाद बिल चुका कर मैं वापस टायर वाले के पास आया तो उसने मुझे स्पष्ट रूप से बता दिया कि यह टायर सेट नहीं हो सकता इसमें कोई मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट है। अब मैं क्या करता पुराना टायर बुरी तरह से घिस चुका था। तो उसी ने एक आईडिया दिया और कहा की पुरानी ट्यूब को ही नए ट्यूबलेस टायर में लगवा लीजिए तो किनारों से हवा की लीकेज बंद हो जाएगी और आपको ट्यूबलेस टायर की शक्ति भी मिल जाएगी। मरता क्या न करता। मेरे पास कोई दूसरा ऑप्शन तो था नहीं। तो मैंने यही किया उसके बाद गाड़ी स्टार्ट की हाईवे किनारे पेट्रोल लिया और गाड़ी को भगा लिया। हाईवे पकड़ते पकड़ते लगभग ढाई बज चुके थे। अब मेरा लक्ष्य था मुजफ्फरपुर, क्योंकि मुझे लगा कि इसके आगे मैं आज नहीं जा सकता। गोपालगंज से लगभग 50 किलोमीटर के बाद हाईवे गंडक नदी को पार करता है। थोड़ी देर आराम करने के लिए मैं पुल पर रुका, कुछ फोटोग्राफी की, और फिर मोटरसाइकिल पर सवार हो गया। आगे पिपराकोठी नाम की जगह पर नेशनल हाईवे 527 डी आकर नेशनल हाईवे 27 में मिल जाता है। यह मार्ग एशियन हाईवे 42 कहलाता है। नेशनल हाईवे 42 चीन के लांझू नामक जगह से नेपाल होते हुए बिहार के नवादा के पास बाढ़ी नामक जगह तक जाता है। तो यहां से मुजफ्फरपुर तक हम एशियन हाईवे संख्या 42 पर थे। मुजफ्फरपुर पहुंचते पहुंचते शाम के छह बज गए थे। नवंबर का महीना होने के कारण हम इसे रात के छह भी कह सकते हैं क्योंकि अंधेरा हो चुका था और लाइट्स जल चुकी थी। क्योंकि अभी छह बज रहे थे इसलिए मैंने और आगे जाने का फैसला किया और लक्ष्य दरभंगा को रखा। मुजफ्फरपुर से एशियन हाईवे 42 को छोड़कर नेशनल हाईवे संख्या 27 पर ही आगे बढ़ जाने पर मैं दरभंगा की तरफ बढ़ गया। मुजफ्फरपुर से दरभंगा करीब 75 किलोमीटर दूर है इसलिए मुझे भी कोई जल्दी नहीं थी और मैं आराम से जा रहा था। रास्ते में एक ढाबा देखकर रुका। ढाबे में कोई ग्राहक नहीं था। बस 2-3 कर्मचारी थे जो रात के खाने की तैयारी कर रहे थे। मैंने पूछा नाश्ते में क्या मिल सकता है तो सीधा जवाब मिला घुघुनी या पनीर पकोड़ा। यानी या तो धुर बिहारी नाश्ता या फिर दिल्ली वाला। मुझे बिहारी खाना बहुत पसंद है लेकिन घुघुनी बिल्कुल पसंद नहीं है। इसलिए मैंने पनीर पकौड़ा का ऑर्डर दे दिया। वहां बैठकर मैंने बड़े मजे से पनीर पकोड़े खाए और एक बार फिर मोटरसाइकिल पर बैठ कर आगे बढ़ गया। हाईवे पर सीधे चलते चले जाएं तो रेलवे लाइन पार करने के बाद एक चौराहा आता है। उस चौराहे से दाहिने मुड़ जाने पर अप दरभंगा शहर में प्रवेश कर जाते हैं। लेकिन गूगल बाबा की जय हो। उन्होंने उस चौराहे से करीब 10 किलोमीटर पहले ही मुझे दाहिनी तरफ मोड़ दिया और सिंगल लेन की सुनसान सड़क पर दौड़ा दिया। और सड़क भी ऐसी सुनसान कि न कोई इंसान दिखे ना कोई घर दिखे ना कोई दुकान दिखे। बीच-बीच में एकाध ट्रक वाले सामने से आ जाते। ऐसे ही समय में सबसे ज्यादा भगवान की याद आती है। जैसे तैसे मैं दरभंगा पहुंचा। फिर गूगल महाराज ने दरभंगा के सारे गली कूचे घुमा कर एक गंदे से मोहल्ले में यह कह कर खड़ा कर दिया लो भाई साहब यही दरभंगा है। मैंने कहा रहने दो गूगल महाराज आप केवल नक्शा दिखाओ जाना कहां है वह मैं तय करूंगा। उसके बाद मैंने नक्शे में मेन मार्केट खोजा और उसकी तरफ चलता हुआ मैं हाजमा चौक पहुंचा। अभी लगभग 8 ही बज रहे थे इसलिए पूरा शहर जगा हुआ था और मार्केट में चहल पहल थी। मैं लहरिया सराय टावर चौक के पास एक होटल में कमरा लिया, हाथ मुंह धो कर बाजार में खाना खाने निकला। चिकन लॉलीपॉप और रोटी खाया और आकर चैन से सो गया।
जै जै
 |
| तैयारी पूरी |
 |
| चाबी बनते हुए |
 |
| गोपालगंज से आगे बढ़ने को तइयार |
 |
| पनीर पकौड़े |
 |
| गंडक पुल पर |
 |
गंडक पुल पर
|