25 नवंबर रविवार
सिलीगुड़ी
आज चादर तान कर देर तक सोता रहा। आज उठने की कोई जल्दी भी नहीं थी क्योंकि आज ज्यादा दूरी तय नहीं करनी थी। सिम्मी की दोस्त क्रिपा का घर रांगपो से 12- 15 किलोमीटर ही दूर था और सिलीगुड़ी से रांगपो लगभग 80 किलोमीटर है। आराम से आठ बजे तक तैयार हुआ और होटल से चेक आउट कर दिया। सोचा नाश्ता रांगपो में ही करूंगा और मोटरसाइकिल दौड़ा दी।
सुबह का समय था इसलिए सिलीगुड़ी में कुछ खास ट्रैफिक नहीं मिला। नदी के पास पहुंचने पर सड़क महानंदा अभयारण्य में घुस जाती है। अभयारण्य के अंदर गाड़ी चलाने का मजा ही कुछ और है। दोनों तरफ ऊंचे ऊंचे सीधे खड़े पेड़, सड़क पर ना के बराबर ट्रैफिक और थोड़ी दूरी पर आप के समानांतर चलती हुई तीस्ता नदी जो कि कभी नजर आए कभी छुप जाए। इस स्वर्ग जैसे नजारे का आनंद अनुभव ही किया जा सकता है, वर्णन नहीं किया जा सकता। इसलिए इस नजारे के सौंदर्य के लिए मैं नेति, नेति( अर्थात इतना ही नहीं, इतना ही नहीं) कह कर आगे बढ़ता हूं।
थोड़ा आगे जाने पर रेलवे लाइन ने हाईवे को क्रॉस किया और उसके बाद बकायदा पहाड़ी रास्ता शुरू हो गया। जीवन में पहली बार मैं पहाड़ी में मोटरसाइकिल चला रहा था। सोच कर तो बहुत डर लगता था लेकिन एक बार जब आगे बढ़ा तो आत्मविश्वास आ गया। वैसे भी चढ़ाई उतराई की अपेक्षा आसान होती है। अब मैं तीस्ता नदी के बिल्कुल किनारे किनारे चल रहा था। थोड़ा आगे जाने पर तीस्ता नदी पर बना एक बांध दिखा जिसका नाम तीस्ता लोवर डैम नंबर फोर लिखा हुआ था लेकिन मुझे उसकी हेड रेज टनल कहीं नहीं दिखी। बाद में मैंने गूगल मैप पर भी उसके पावर हाउस का लोकेशन खोजने की कोशिश की लेकिन वो भी नहीं मिला। यदि किसी मित्र को पता हो कि इस डैम का पावर हाउस कहां पर है और हेड रेज टनल कहां से निकलती है तो बड़ी कृपा होगी।
सड़क कहीं बहुत अच्छी थी तो कहीं बहुत खराब थी। पहाड़ी सड़कें सामान्यतः रिज लाइन पर तो बहुत अच्छी होती है लेकिन वैली लाइन पर खराब हो जाती है। वास्तव में होता यह है कि सड़क का जो हिस्सा रिज लाइन यानी धार पर होता है उस पर पानी आता नहीं और आता भी है तो टिकता नहीं इसलिए सड़क अच्छी होती है। जबकि इसके विपरीत वैली लाइन यानी की घाटी की लाइन पर सारा पानी इकट्ठा होकर आता है और हल्की बारिश में भी वहां छोटा-मोटा नाला या झरना बन जाता है। डामर की सड़क का पानी जानी दुश्मन है इसलिए वहां की सड़क खराब हो जाती है।
जंगल पहाड़ और नदी का आनंद लेते हुए मैं आगे बढ़ता जा रहा था। अब भूख लगने लगी थी तो रंबी बाजार में नाश्ता करने के लिए रूक गया। एक ठीक ठाक से होटल में घुसा और खाने के बारे में पूछताछ करके तड़का-रोटी का आर्डर दे दिया। फिर कुछ सोच के आमलेट के लिए भी बोला तो दुकान वाले ने सुझाव दिया कि अंडे को तड़के में मिला दिया जाय। खाने के मामले में प्रयोग करना मुझे बहुत पसंद है सो मैंने तत्काल सहमति दे दी। और विश्वास मानिए मुझे बिल्कुल निराश नहीं होना पड़ा। चार रोटियां और एक प्लेट चावल दबा कर आगे बढ़ा।
आराम से चलते हुए लगभग सवा नौ बजे तीस्ता बाजार स्थित तीस्ता पुल पर पहुंच गया। यहां तीस्ता नदी पार न कर सीधे चलें जाएं तो दार्जिलिंग की तरफ चले जाएंगे जबकि यदि नदी पार कर दाहिनी तरफ मुड़ जाएं तो कलिंपोंग पहुंच जाएंगे। मुझे इनमें से कहीं नहीं जाना था इसलिए तीस्ता पुल पर कुछ फोटो क्लिक करने के बाद पुल पार कर के सीधा रास्ता पकड़ लिया जो रांगपो जाता है।
थोड़ा आगे जहां रंगीत और तीस्ता नदियों का संगम होता है वहां से नदी के दूसरी ओर सिक्किम शुरू हो जाता है अर्थात मैं बंगाल में चल रहा था लेकिन सिक्किम के साथ साथ चल रहा था। यहां से रांगपो तक तीस्ता नदी ही बंगाल और सिक्किम की सीमा बनाती है। रांगपो से तीस्ता नदी गांतोक की तरफ निकल जाती है और सिक्किम और बंगाल की सीमा रांगपो नदी के साथ चलने लगती है।
अब यहां से मुझे जाना था सेंट्रल पैंडम। गूगल मैप में लिखकर सर्च किया तो फौरन मिल गया और मैंने नेविगेशन ऑन करके गाड़ी उस तरफ बढ़ा दी। अब नेशनल हाईवे छोड़ कर मुझे ग्रामीण सड़कों पर चलना था। थोड़ा आगे जाते ही मुख्य सड़क छोड़कर एक लेन की सड़क पर निकलना पड़ा। एक तो पतली सड़क ऊपर से जबरदस्त चढ़ाई। गाड़ी दो नंबर से ऊपर नहीं जा पा रही थी लेकिन नजारे भी उतने ही सुंदर थे।
मैं आनंद लेता हुआ आगे बढ़ रहा था। लगभग 10 किलोमीटर जाने के बाद गूगल देवता ने मुझे इस सड़क को भी छोड़ कर एक कच्ची सड़क पर उतरने को कहा। मैं उतर गया। तीन चार किलोमीटर आगे जाने के बाद एक सज्जन से मैंने गांव के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि अभी आपको पक्की सड़क पकड़कर ही तीन-चार किलोमीटर आगे जाना था। मैंने गूगल देवता के सम्मान में दो चार अच्छी अच्छी बातें कहीं और फैसला किया वापस लौटते ही गूगल मैप पर इस गांव का लोकेशन सही करूंगा। वापस पहले वाली सड़क पर आ गया और आगे बढ़ा। चार किलोमीटर आगे जाने के बाद एक बड़ी प्यारी जगह मिली। पूरी ढलान पर पीले पीले फूल खिले थे। ऊपर से नीचे तक पूरा पहाड़ पीला ही दिख रहा था। पता नहीं यह फूल प्राकृतिक थे या किसी ने खेती की थी लेकिन नजारा जबरदस्त था। मैंने सोचा वापसी मैं इस की फोटोग्राफी करूंगा और आगे बढ़ गया। लगभग 1 किलोमीटर और आगे जाने के बाद एक बार फिर मैंने उस गांव के बारे में पूछा और एक बार फिर मुझसे कहा गया कि आप ज्यादा आगे आ गए हैं। दो किलोमीटर पीछे जाइए। वहां से एक सड़क बाईं तरफ ऊपर की ओर जाती हुई मिलेगी उस पर जाना है। मैंने गाड़ी वापस घुमाई और उस फूलों भरी जगह पर आ गया। थोड़ी देर विश्राम किया, दो चार सेल्फीली। कैमरा निकाल कर कुछ फोटो भी खींचे फिर क्रिपा को कॉल किया। उसने मुझसे कहा कि आप वीडियो कॉल करिए तो मैं बता दूंगी आप कहां हैं और किधर जाना है। मैंने वीडियो कॉल भी किया लेकिन उसको कोई आईडिया नहीं मिला।
मैंने गाड़ी वापस घुमाई तो थोड़ी दूरी पर सच में एक तिराहा था और एक सड़क ऊपर की तरफ जा रही थी मैंने वह सड़क पकड़ ली और आगे जाने पर क्रिपा की बताई हुई निशानियां जैसे लाल रंग का मंदिर, एक पीले रंग का घर और एक हाई स्कूल नजर आईं। जब हाई स्कूल दिखा तो मैं वहां रुक गया और फिर मैंने फिर क्रिपा को फोन किया और कहा मैं हाई स्कूल पर हूं तो जवाब में मुझे एक बार फिर यही सुनने को मिला कि आप आगे आ गए हैं। दो सौ मीटर पीछे आइए। मेरा घर मंदिर के पास है और मेरे घर के सामने की स्कॉर्पियो खड़ी होगी। राय साहब एक बार फिर वापस मुड़े लेकिन इस बार ठीक ठीक बताए गए घर तक पहुंच गए।
घर पर क्रिपा की माताजी मिलीं जो की एक शिक्षिका हैं। उसके भैया भाभी जो कि रंगपो में रहते हैं वह कहीं बाहर गए हुए थे और संजोग से उसके पिताजी भी बाहर ही गए हुए थे। घर पर केवल उसकी माताजी और उसकी छोटी बहन मिले। उनसे काफी सारी बातें हुई और बढ़िया सा लंच हुआ। इसी बीच हमारा मित्र शुशांत सिंह जोकि आजकल सीमा सड़क संगठन में कार्यरत है आजकल सिक्किम में ही पोस्टेड है। मैं सुबह से ही उसको कॉल लगाने की कोशिश कर रहा था और कॉल नहीं लग रही थी उसे कॉल लग गई और उसने रात्रि विश्राम के लिए उन्होंने अपने यहां आमंत्रित किया। वह एनएचपीसी के कैंप कॉलोनी में रहता है। रांगपो से सिंगथाम अठारह किलोमीटर है और सिंगथाम से एनएचपीसी की कॉलोनी लगभग 7 किलोमीटर है।
मैं वापस रंगपो आया और सिंगथाम का रास्ता पकड़ लिया। पूछते पूछते मैं कॉलोनी तक तो पहुंच गया लेकिन आज सुबह से जैसा कि हर बार होता आया था, जहां से मुझे सड़क छोड़नी थी उससे लगभग दो किलोमीटर आगे बढ़ गया फिर शुशांत को फोन लगाया। उसने वापस आने को कहा। मैं वापस आया तो कॉलोनी के गेट पर शुशांत अपनी कार के साथ खड़ा था। मैं उसके साथ उसके घर पहुंचा। घर पर उसकी पत्नी और बेटी से मुलाकात हुई। अभी सूरज डूब ही रहा था और मैं अपने लक्ष्य तक पहुंच चुका था। आज मैं मात्र 120 किलोमीटर की यात्रा किया था। शुशांत के घर पर शाम अच्छी व्यतीत हुई हम लोग बैठ के काफी देर तक बातें करते रहे। रात को खाने में देसी मुर्गे की मोटी सी टांग थी। पूरे पूर्वोत्तर में जहां भी मुझे मुर्गे की टांग मिली जंबो साइज ही मिली। पता नहीं क्यों दिल्ली वाले ऐसी टांग वाले मुर्गे क्यों नहीं बेचते। आज के लिए सिर्फ इतना ही ।
जै जै
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| सिलिगुड़ी से प्रस्थान |
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| तीस्ता |
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| फूलों की घाटी |
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| कृपा के घर |
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| रंबी बाजार में नाश्ता |
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| तीस्ता पुल पर |
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कृपा के घर शानदार लंच
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महानंदा नदी में भी नहाये होते तो वही अनुभूति होती जो खनुआ नदी नहाने में हुई थी!
जवाब देंहटाएंअच्छा लिखा है बहुत ही मड़ेदार
जवाब देंहटाएंMehar Adnan
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