मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

दो पहियों पर पूर्वोत्तर : छठा पड़ाव : काजीरंगा नेशनल पार्क, कोहरा

28 नवंबर 2018 बुधवार
गोहाटी

आज केवल दो सौ कीलोमीटर जाना था सो आराम से देर तक सोता रहा। आराम से दस बजे तक सोता रहा फिर हाथ मुंह धोकर मोटरसाइकिल उठाया और बाहर निकला। इरादा था कि उमानंद मंदिर जाया जाए। यह मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीचो-बीच एक टापू पर है। नाव वाले यहां तक आने जाने का किराया ₹100 लेते हैं। मुझे मंदिर में कुछ कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। केवल ब्रह्मपुत्र का आनंद लेना था। मैं मोटरसाइकिल लेकर ब्रह्मपुत्र के किनारे किनारे उमानंद मंदिर जाने वाले फेरी घाट की तरफ बढ़ रहा था तब तक एक बोर्ड दिखा। “गोहाटी मध्यम कांडा फेरी सर्विस”। हमने कहा बस इसी की तो जरूरत थी। ये सेवाएं दैनिक यात्रियों के लिए चलती है इसलिए काफी सस्ती होनी चाहिएं। मैंने उस गेट में बाइक घुसा दी। बाइक अंदर घुसाते ही सामने खुला मैदान था और उसके बाद नदी थी। नदी में एक तरफ एक छोटा सा कंक्रीट का प्लेटफार्म बना कर उसके ऊपर लचित बोरफुकान और उसके साथियों की मूर्तियां लगी हुई थी। लचित बोरफुकान अहोम साम्राज्य के बहुत बड़े सेनापति हुए हैं जिन्होंने मुगलों को नाकों चने चबा दिए थे और उनको पूर्वोत्तर में घुसने नहीं दिया। आज भी एनडीए में बेस्ट कैडेट को लचित बोरफुकान अवार्ड दिया जाता है। एक तरफ फ्लोटिंग घाट बना हुआ था। मैं मोटरसाइकिल लेकर उसमें घुस गया। थोड़ी देर में नाव आई तो मैं मोटरसाइकिल लेकर नाव में चढ़ने लगा। दरवाजे पर टिकट कंडक्टर बैठा हुआ था। चुंकि मुझे पता तो था नहीं कि कितने पैसे लगते हैं इसलिए मैंने उसकी तरफ सौ का नोट बढ़ा दिया। और शायद वह भी इस बात को समझ गया इसलिए उसने मुझसे तुरंत पूछा खुला दस का नोट नहीं है? मैंने तुरंत उससे सौ का नोट वापस लिया और 10 का नोट पकड़ा दिया। लेकिन यह क्या उसने उस ₹10 में से भी ₹3 वापस किए। यानी कि मोटरसाइकिल समेत ब्रह्मपुत्र पार करने का किराया कुल ₹7। कहां बिना मोटरसाइकिल के मैं ₹100 देने वाला था और कहां केवल सात और सात कुल ₹14 में अपना काम हो गया। बोट में बैठकर में नदी के नजारे लेने लगा। थोड़ी देर में एक मुढ़ी वाला आकर बोट पर ही अपना खोमचा से लगा कर मुढ़ी बेचने लगा मैंने भी ₹10 का एक दोना ले लिया और खाते हुए प्रकृति का आनंद लेने लगा। थोड़ी देर में ही बोट चल पड़ी और करीब 15-20 मिनटों में लहरों को चीरते हुए दूसरे छोर पर पहुंचा। दिया सुबह से कुछ नाश्ता भी नहीं किया था इसलिए बाइक लेकर नजदीक के बाजार में पहुंच गया। एक छोटी सी नाश्ते की दुकान में बैठा और पता किया कि नाश्ते में क्या उपलब्ध है। वहां पर रोटी और छोले उपलब्ध थे। मैंने साथ में एक आमलेट की बनवा लिया और आराम से बैठकर नाश्ते का आनंद लिया। नाश्ता निपटा कर फिर उसी रास्ते वापसी के लिए चल पड़े। ₹7 का टिकट लेकर बाइक समेत नाव पर सवार हो गया। लेकिन नाव के चलने में भी काफी समय बाकी था सो नाव के कोने में खड़ा होकर फोन में व्यस्त हो गया। अनायास ही निगाहें नदी के विशाल जल साम्राज्य की तरफ उठ जाती थी। तभी अचानक थोड़ी दूरी पर मुझे पानी में हलचल नजर आई। मैंने फोन के चक्कर में उस पर ध्यान नहीं दिया थोड़ी देर बाद निगाह उठाई तो वैसे ही हलचल दूसरी जगह हो रही थी। मैंने फोन को जेब में रखा और पानी पर ध्यान से देखने लगा। थोड़ी देर में मुझसे करीब 200 मीटर की दूरी पर एक बार फिर वही हलचल हुई और जो चीज नजर आई वह देख कर मैं उछल पड़ा। जी हां, वह एक फ्रेश वाटर डॉल्फिन थी। फिर तुम्हें फोन वोन भूल गया और लगातार पानी में डॉल्फिन्स को देखने लगा। थोड़ी देर में वो पानी में से अपनी लंबी थूथन निकालतीं और छोटी सी छलांग मार कर गुम हो जातीं। लगभग आधे घंटे बाद नाव वहां से खुली और तब तक मैं डॉल्फिन्स की अठखेलियों में ही गुमा रहा। मैंने गलती से भी फोटो लेने की कोशिश नहीं की, क्योंकि मुझे पता था कि इसका कोई लाभ नहीं होगा। चारों तरफ फैली अथाह जल राशि में डॉल्फिन कहां नजर आएगी कुछ पता नहीं था। और जब नजर आती तब कैमरा घुमाने का मौका दिए बिना पानी में गायब हो जातीं। नाव से उतर कर लगभग 12:00 बजे में होटल पहुंचा। वहां से फटाफट चेक आउट किया, अपना सामान लादा, गूगल गाइडेंस देवता को काजीरंगा नेशनल पार्क को लक्ष्य बनाने को कहा और उनके बताए रास्ते पर मोटरसाइकिल दौड़ा दिया। रास्ते में एक जगह निकॉन की एजेंसी नजर आई तो वहां रुक कर लगभग ₹3000 का एक ट्राइपॉड ख़रीदा। क्योंकि जैसा आपको पता है पिछला ट्राइपॉड पिछली रात को टूट चुका था। शहर की भीड़भाड़ से बाहर निकल कर नेशनल हाईवे नंबर 3 पकड़ कर मैं आगे बढ़ा। शानदार चार लेन की सड़क थी। अच्छी स्पीड मिल रही थी मैं बढ़ता चला गया। रास्ते में जगह-जगह सड़क के किनारे स्थानीय विक्रेता अनानास और संतरे बेच रहे थे। हालांकि मैंने दबाकर नाश्ता किया हुआ था लेकिन मुझे अनानास बहुत पसंद है इसलिए कुछ दूर जाने के बाद एक जगह रुका और बिना मोलतोल किए एक अनानास का ऑर्डर दे दिया। दुकानदार ने बढ़िया से उसको छील काटकर उसके टुकड़े करके मुझे दे दीए। मैंने पॉलिथीन पकड़ा और वही खड़े खड़े उससे बातें करते हुए सारा निपटा दिया। अब पेट में मामला गंभीर हो गया था इसलिए मैं एक बार फिर मोटरसाइकिल पर बैठा और आगे बढ़ा। बात की बात में मैं नगांव पार कर गया कालियाबोर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा हो गया था और गूगल देवता अभी भी मेरा लक्ष्य 30 किलोमीटर दूर बता रहे थे। मैं बढ़ता रहा। थोड़ी देर बाद ही जंगल शुरू हो गया। जंगल में बड़े-बड़े नियंत्रित गति की चेतावनी के बोर्ड लगे हुए थे। हम भारत के एक बहुत ही महत्वपूर्ण अभ्यारण में प्रवेश कर चुके थे इसलिए वहां पर नियंत्रित गति में चलना बहुत ही महत्वपूर्ण था। अधिकतम गति 40 किलोमीटर प्रति घंटे की थी जिस का उल्लंघन करने पर न्यूनतम जुर्माना ₹5000 था। यही नहीं हर 1 किलोमीटर पर रंबल स्ट्रिप स्पीड ब्रेकर बने हुए थे जहां पर आपको वाहन 20 की स्पीड में चलाना था। मैं ठहरा नियम कानूनों को मानने वाला व्यक्ति। गति सीमा के अंदर गाड़ी चलाता हुआ उस जगह पहुंचा जहां पर गूगल महाराज ने कह दिया कि लो भाई तुम्हारा लक्ष्य आ गया। रात के लगभग 8:00 बजे जंगल के बीचो बीच मैं  बेवकूफ की तरह  खड़ा होकर आसपास देख रहा था। जब सिवाय अंधेरे और पेड़ों के और कुछ नहीं दिखा तो मैंने बाइक आगे बढ़ा दी। काजीरंगा नेशनल पार्क का कार्यालय और नजदीकी बाजार कोहरा वहां से लगभग 25 किलोमीटर है। लगभग 9:30 बजे मैं कोहरा पहुंचा। होटल में कमरा कम से कम 1800 का था। मैंने मोलभाव शुरू किया और अंत में वह कमरा मुझे ₹1000 में मिल गया। कमरा निस्संदेह बहुत ही शानदार था लेकिन मेरे बजट के बाहर था। मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था इसलिए मैंने ले लिया। सामान रख कर हाथ मुंह धोया और खाने की तलाश में बाहर निकला। हालांकि उस होटल में भी रेस्टोरेंट था लेकिन अपना सिद्धांत है कि जिस होटल में रुकिए उसमें खाना मत खाइए। होटल से करीब 100 मीटर दूर एक छोटा सा ढाबा मिला जहां पर तड़का रोटी और आमलेट का डिनर किया। वापस आया और बिस्तर के हवाले हो गया।

जै जै
संतरे अनानास की अस्थाई दुकान

महान योद्धा लचित बोरफुकान

टूरिस्ट क्रूजर

उमानंद मंदिर का द्वीप

शुक्रेश्वर महादेव

दूर से आती हमारी नाव

लो जी नजदीक आ गई

नाव पर सवार हमारा वृषभ

नाव पर झाल मुढ़ी

मांगी नाव न केवट आना

पानी को काटती हमारी नाव

दूर एक मंदिर

उस पार के दृष्य

उस पार के दृष्य






तड़का रोटी भुजिया चटनी प्याज



बुधवार, 9 जनवरी 2019

दो पहियों पर पूर्वोत्तर : पांचवां पड़ाव : गोहाटी

27 नवंबर 2018 मंगलवार
नलबाड़ी  
कल एक दिन में 470 कीलोमीटर यात्रा कर लेने से मेरे उपर दबाव काफी कम हो गया था। अब मुझे पांच दिनों में मात्र पांच सौ कीलोमीटर ही जाने की अनिवार्यता थी। सो आराम से आठ बजे तक सोता रहा। तैयार होने के बीच में ही बबीता कोमल जी का संदेश आया कि मैं कहा हूँ। मैंने बताया कि बस पंद्रह मिनट में आपकी सेवा में प्रस्तुत होता हूँ। उनके द्वारा भेजे गए लोकेशन को फालो करता हुआ मैं उनकी दुकान पर उनके श्वसुर जी के पास जा पहुंचा। वो बड़े ही प्रेम से मिले। मेरे बारे में सारी जानकारी ली और दुकान के एक कर्मचारी के साथ मुझे घर भेज दिया। घर पर बबीता जी और उनके पतिदेव मिले। काफी समय तक अलग अलग मुद्दों पर चर्चा हुई। फिर उन्होंने शानदार लंच कराया। उनकी पुस्तक और फिर मिलने के वादे के साथ मैंने उनसे विदा ली। आज का लक्ष्य गुवाहाटी था जो कि वहाँ से हाइवे के रास्ते जाने पर लगभग 70 कीलोमीटर था। बबीता जी ने मुझे हाइवे के बजाय हाजो होकर जाने की सलाह दी क्योंकि वहां हयग्रीव माधव का मंदिर था। साथ ही यह मार्ग लगभग दस कीलोमीटर छोटा भी था। मुझे बिना पत्नी के मंदिर जाना बिल्कुल पसंद नहीं क्योंकि विवाह का एक वचन ये भी होता कि मैं तुम्हे साथ लिये बिना कभी भी तीर्थयात्रा नहीं करूंगा। पूरी यात्रा में यहीं एक मंदिर था जहाँ मैंने दर्शन किये। इस मंदिर का निर्माण सोलहवीं शताब्दी में राजा रघुदेव नारायण ने कराया था। यहाँ भगवान विष्णु की पूजा हयग्रीव (जिसकी गर्दन घोड़े की हो) के रूप में की जाती है। इसके पीछे एक कथा आती है कि भगवान ने यह रूप ले कर हयग्रीव नाम के ही एक दैत्य का वध कर वेदों की रक्षा की थी। मंदिर मणिकूट नाम की छोटी सी पहाड़ी पर बना हुआ है। मंदिर बहुत ही कलात्मक है और दीवारों पर बहुत ही सुंदर सुंदर कलाकृतियां बनी हुई है। जब मैं पहुंचा तो वह भगवान के भोग लगाने का समय था इसलिए मुझे प्रतीक्षा करनी पड़ी। भोग के समय के पश्चात पुजारी जी ने मुझे बहुत ही अच्छे से दर्शन करवाए। वहां से प्रसाद पाकर मैं आगे बढ़ा। कुछ आगे जाने पर मुझे ब्रह्मपुत्र के प्रथम दर्शन हुए। ब्रह्मपुत्र के किनारे किनारे ही चलता हुआ मैं गोहाटी के पास पहुंचा। अब मुझे सिर्फ पुल पार करना था और मैं गोहाटी में होता। पहले गोहाटी में जाने के लिए सिर्फ एक पुल था जोकि एक रेल-सह-सड़क पुल है। लेकिन अब इसके ठीक बगल में एक नया पुल बन गया है। पुराने पुल को अब एक लेन के लिए प्रयोग करते हैं और नए पुल को दूसरी लेन के लिए। जब मैं इस पुल पर पहुंचा तब शाम का समय था और सूर्यास्त होने ही वाला था। मैं जिस लेन में था वह पूर्व दिशा में थी इस कारण से सूर्यास्त के फोटो अच्छे नहीं आते। मैंने तेजी से पुल को पार किया, यू टर्न लिया और नए पुल के रास्ते ब्रह्मपुत्र के बीच में आ खड़ा हुआ। मुख्य लेन के किनारे पैदल और साइकिल वालों के लिए एक अलग लेन बनी हुई है जिसे करीब 4 फुट की बाउंड्री से अलग किया गया है। मैं उस बाउंड्री को फांद कर पैदल लेन में पहुंचा। ट्राइपाड लगा कर कैमरे को सेट किया और सूर्यास्त की फोटो लेना शुरू कर दिया। लंबी चौड़ी ब्रह्मपुत्र में सूर्यास्त का दृश्य बहुत ही प्यारा लग रहा था। सूर्यास्त के बाद इधर उधर की कुछ तस्वीरें खींची और एक बार फिर पुल पार करके यू टर्न लिया और फिर पुल को पार किया। अब मैं गुवाहाटी में प्रवेश कर चुका था। क्योंकि शाम का समय था इसलिए ट्रैफ़िक काफी हैवी था। मैं धीमी गति से ही आगे बढ़ता रहा और जल्दी ही शहर के अंदर पहुंच गया। भारालूमुख एरिया में एक होटल लिया। होटल में सामान रखा, मोटरसाइकिल उठाया और ऐसी जगह की तलाश में निकला जहां से गुवाहाटी शहर का रात में फोटो लिया जा सके। गूगल में एक हिल टॉप व्यू प्वाइंट नाम की जगह दिखा रहा था मैं वही पहुंचा। लेकिन वहां से गुवाहाटी शहर का कुछ हिस्सा ही दिखाई दे रहा था। बाकी हिस्सा पेड़ों से ब्लॉक हो गया था। जैसे तैसे मैंने फोटो लिए और वापस नीचे गुवाहाटी शहर में आया। एक मित्र की सलाह पर मैं शुक्रेश्वर महादेव मंदिर पहुंचा ताकि ब्रह्मपुत्र के किनारे रात की फोटोग्राफी कर सकूं लेकिन इस मेहनत का भी कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। उसके पश्चात मैंने गूगल देवता की सहायता से स्थानीय भोजन देने वाले रेस्टोरेंटों की तलाश की और उनमें से एक में भोजन करने पहुंचा। मीनू देख कर मैं तय नहीं कर पा रहा था कि मैं क्या आर्डर करूं।असमिया भोजन की कम से कम आठ-दस तरह की थालियां उपलब्ध थीं। शाकाहारी थाली अलग थी, बंबू थाली अलग थी, चिकन थाली, मटन थाली, डक थाली, पोर्क थाली, मिक्स थाली आदि आदि भी उपलब्ध थीं। मैंने पोर्क थाली का ऑर्डर दिया। चावल के साथ दो या तीन शाकाहारी आइटम थे और कम से कम 8 पोर्क के आइटम थे। मैं आराम से मजे ले लेकर खाता रहा। वहां से खाना खाकर बाहर निकलते ही मेरे साथ एक छोटी सी दुर्घटना घट गई और मुझे ₹3000 का चूना लग गया। हुआ यह की जो पिट्ठू बैग था उसका चेन पूरा खुल गया था और मैंने ध्यान नहीं दिया। जब मैंने मोटरसाइकिल स्टार्ट करके घुमाई तो ट्राइपॉड गिर गया। जब तक मेरा ध्यान जाता और मैं गाड़ी खड़ी करके वापस आकर ट्राइपॉड उठाता, तब तक एक कार वाला ट्राइपॉड को रौंदता हुआ निकल गया। मैंने टूटे ट्राइपॉड को उठाया। उसके तीन टांगों में से दो शहीद हो चुकी थीं। मैंने उसकी तीसरी टांग भी तोड़ कर निकाल दी और अब मैं उसका इस्तेमाल मोनोपॉड के तौर पर करता हूं। बुझे मन से वापस होटल आया और बिस्तर के हवाले हो गया। जय जय
बबीता जी और बबली के साथ
बबीता जी के सौजन्य से.......


हयग्रीव माधव का प्रसाद

ब्रह्मपुत्र के पुल पर


हयग्रीव माधव मंदिर का मुख्यद्वार









ब्रह्मपुत्र के प्रथम दर्शन

पुल से











गोहाटी शहर

नदी के उस पार एक बोट







बुधवार, 2 जनवरी 2019

दो पहियों पर पूर्वोत्तर : चौथा पड़ाव : नलबाड़ी

26 नवंबर 2018 सोमवार
सिंगथाम एनएचपीसी

आज के लिए मैंने कोई लक्ष्य नहीं रखा था। चूंकि मैं वास्तविक योजना से काफी पीछे चल रहा था इसलिए आज मैंने अधिक से अधिक दूरी तय करने का मन बनाया था। सुशांत तो सुबह जल्दी उठ कर ऑफिस निकल गया और मुझसे मिलते हुए जाने को कहता गया। मुझे इससे कोई समस्या नहीं थी क्योंकि उसका ऑफिस रास्ते में ही था। भाभी जी ने गर्मागर्म आमलेट का नाश्ता कराया। फिर उनसे विदा ले कर मैं वहां से निकला। थोड़ी देर में मैं सुशांत के आफिस में पहुंचा जहां मुझे पता चला की साहब जीरो साइट पर हैं। सड़कों पर साइटों के नाम किलोमीटर पर आधारित होते हैं। किसी साइट का नाम इस बात को दर्शाता है कि वह बेस प्वाइंट से कितनी दूर है। इसलिए जीरो साईट यानी वह जगह जहां से सड़क  का यह सेक्शन शुरू होता है जो कि सिंगथाम में था। मैं वहां पहुंचा तो सुशांत यूनीफार्म चढ़ाए, मुंह पर डस्ट मास्क चढ़ाए अपने काम में लगा हुआ था। उससे मिल कर मैंने विदा ली और वापस निकल लिया। कल जिस रास्ते से मैं यहां आया था आज उसी रास्ते से वापस जा रहा था और ऐसा करना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है। लेकिन इसके सिवा कोई दूसरा चारा भी नहीं था क्योंकि दूसरा रास्ता बहुत मुश्किल और बहुत लंबा था और मैं ऑलरेडी अपनी योजना से पीछे चल रहा था। सिंगथाम से रांगपो को पहुंचा फिर वहां से वापस चलता हुआ आगे बढ़ा। उतरने में एक्सीलरेटर की जरूरत कम और क्लच ब्रेक की जरूरत ज्यादा पड़ रही थी। 10-12 किलोमीटर आने के बाद मेरी गाड़ी ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। स्टार्ट करने पर स्टार्ट तो हो जाए लेकिन  क्लच छोड़ते ही बंद हो जाए। फिर मैंने  धक्का देकर आगे बढ़ाने की कोशिश की तो भी गाड़ी ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। तब मुझे पता चला कि अगले पहिये में मौजूद डिस्क ब्रेक जाम हो गया है। सामने ही एक छोटा सा रेस्टोरेंट था। मैं उस में जाकर बैठ गया और विचार करने लगा कि क्या किया जाए। सबसे पहले अपने मित्र मकैनिक चुलबुल को फोन लगाया लेकिन उसका फोन लग ही नहीं रहा था। सही बात है बुरे समय में तो साया भी साथ छोड़ देता है। उसके बाद मैंने अपने एक दूसरे मित्र पवन को जिसकी दुकान चुलबुल की दुकान के पास में ही है, को फोन लगाया और उससे चुलबुल से बात कराने को कहा तो पता चला कि चुलबुल बाबू कहीं गए हुए हैं। मैंने कहा, भाई उसकी दुकान के किसी भी मैकेनिक से बात करा दो। तो मेरी बात उसके छोटे भाई राम ज्ञान से हुई। उसने मुझे बताया की 11 नंबर पाना से एक छोटे से नट, जिसके ऊपर एक छोटा सा नोजल बना हुआ होगा और वह रबर की कैप से ढका हुआ होगा को ढीला करने से ब्रेक ढीला हो जाएगा। मुझे वह नट तो आराम से मिल गया लेकिन वहां बीच रास्ते में 11 नंबर पाना कहां से लाता। जब कुछ नहीं सूझा तो सामने के होटल में बैठकर दो अंडों के साथ एक प्लेट मैगी का ऑर्डर दे दिया और बैठकर सोचने लगा। मैं जब भी परेशान होता हूं तो सारी झल्लाहट, सारा गुस्सा, सारी परेशानी खाने पर निकालता हूं। घर पर भी अगर मैं अपने नियमित भोजन से ज्यादा खाने लगता हूं तो मेरी पत्नी समझ जाती है कि आज मैं परेशान हूं। मेरे खाने के दौरान ही एक पिक-अप वाला आया और वह भी खाना मंगा कर कर खाने लगा। मैंने अपनी मैगी खत्म की और उससे पूछा क्या उसके पास 11 नंबर पाना है तो उसका जवाब सकारात्मक निकला और बोला खाना खा कर देता हूं। मैं प्रतीक्षा करने लगा लेकिन बीच में ही उसने अपने क्लीनर को आवाज लगाई और पाना देने को कहा। क्लीनर से पाना लेकर मैं वह नट खोलने की कोशिश करने लगा। लेकिन जब किस्मत ही खराब हो तो इंसान हाथी पर भी बैठा हो तो कुत्ता काट लेता है। वह नट काफी पुराना लगा हुआ था और इसलिए बहुत जाम था। अंत में कट पाना उसके ऊपर फिसल गया। मैं तो बुरी तरह से इरिटेट हो गया। बड़ी मुश्किल से तो कटपाना मिला था लेकिन वह फिसल गया। अब मैं यहां रिंग पाना कहां खोजूं। उस नट के पीछे भी एक नट लगा हुआ था जिस को ढीला करने पर हाइड्रॉलिक ऑयल निकल सकता था और शायद उससे ब्रेक ढीला हो जाता। लेकिन उसके लिए  15 नंबर पाना चाहिए था जो कि पिक अप वाले के पास नहीं था। मैंने चाकू निकाला और ब्रेक का हाइड्रोलिक पाइप काट देने का फैसला किया। लेकिन शायद भाग्य इतना ज्यादा भी मेरे विरुद्ध नहीं था। एक ट्रक वाला भी उसी होटल में खाना खा रहा था। पिक अप के ड्राइवर ने उससे 15 नंबर पाना का जुगाड़ कर दिया और लेकर मेरे पास आया। लेकिन तब तक मैं आधा हाइड्रोलिक पाइप काट चुका था भाग्य ठीक था कि अब तक चाकू पाइप के बीच तक नहीं पहुंचा था इसलिए कोई लीकेज नहीं हुई थी। हमने नट ढीला किया और नट ढीला होते ही ब्रेक छूट गया। मैंने उन दोनों ड्राइवरों को धन्यवाद दिया, खाने का भुगतान किया और गाड़ी स्टार्ट कर के आगे बढ़ गया। आगे बढ़ते हुए मैंने तीस्ता ब्रिज पार किया, फिर मैंने तीस्ता पर बने बांध को पार किया और करीब 1 घंटे बाद मैं उस जगह पर पहुंच गया जहां से से मुझे सिलीगुड़ी का रास्ता छोड़कर पुल पार कर लेना था। तीस्ता नदी पर बने पुल का नाम कोरोनेशन ब्रिज है। कोरोनेशन का मतलब होता है राज्याभिषेक। 1937 में जब किंग जॉर्ज सिक्स्थ का राज्याभिषेक हुआ तो उसकी याद में इस पुल का निर्माण शुरू कराया गया था जो कि 1941 में बनकर पूरा हुआ और आम जनता के लिए खोल दिया गया। स्थानीय लोग इसे बाघपुल नाम से पुकारते हैं। यहां से नेशनल हाईवे नंबर 17 शुरू हो जाता है और वह रेलवे लाइन के साथ साथ चलता रहता है। जल्दी ही ऊंची पहाड़ियों से निकल कर सड़क थोड़े खुले इलाके में आ गई। इसके बाद मैंने गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी क्योंकि सड़क के दोनों तरफ चाय बागान थे इसलिए  किनारों से किसी जानवर या इंसान के आने का खतरा नहीं था। चलता हुआ मैं उदलाबाड़ी में एक मैकेनिक के यहां रुका और अगला ब्रेक देखने को कहा। उसने देखते ही कह दिया कि आपके रबर पैड्स घिस चुके हैं और पूरी नई किट लगानी पड़ेगी और नई किट आपको एजेंसी में ही मिलेगी जो कि आगे माल बाजार में है। ब्रेक को मैंने पूरा ढीला कर दिया था लेकिन अब तक वह फिर से आधा टाइट हो चुका था। माल बाजार वहां से थोड़ी ही दूर है। मैं वहां ढूंढते हुए  होंडा के सर्विस सेंटर पहुंचा लेकिन उनके कर्मचारियों ने मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। उन्होंने मेरे रिक्वेस्ट करने पर भी 2 घंटे से पहले गाड़ी को हाथ लगाने से मना कर दिया। मैं झल्ला कर वहां से वापस निकला और एक मैकेनिक यहां रुका। उसने ब्रेक को फिर से ढीला कर दिया और मुझे 11 नबर का रिंग पाना खरीद कर दे दिया कि रास्ते में अगर फिर से ब्रेक जाम हो जाए तो परेशानी ना हो। अगला ब्रेक लगना लगभग बंद हो गया और मैंने इसको गंभीरता पूर्वक नहीं लिया जिससे कि आगे मैं मुसीबत में भी फंस गया। आगे की बात बाद में करेंगे। फिलहाल मैं माल बाजार से आगे बढ़ा। माल बाजार से आगे जलढाका नदी पार की और चलते हुए मध्यमदारी हाट पहुंचा और वहाँ छोटे से रेस्टोरेंट में रुककर लंच किया। लंच में चावल दाल और साग के साथ पता नहीं कौन सी मछली थी। साथ में आमलेट भी ले लिया। लेकिन सबसे ज्यादा मजा साग में ही आया। वहां से निबट कर एक बार फिर चाय के बागानों के बीच से उड़ता हुआ में आगे बढ़ा। आगे तोर्षा नदी पार करके अलीपुरद्वार को बाईपास करता हुआ मैं आगे बढ़ा। अलीपुरद्वार को पार करते ही नेशनल हाईवे 317 खत्म हो जाता है और एक बार फिर नेशनल हाईवे 27 चालू हो जाता है। नेशनल हाईवे 27को  मैंने सिलीगुड़ी में छोड़ा था और अलीपुरद्वार मैं मैं वापस इसी पर आ गया। अब तक की यात्रा का लगभग 80% हिस्सा मैंने नेशनल हाईवे 27 पर तय किया था। चाकचोका से कुछ आगे गदाधर नदी पार करते ही हम बंगाल से असम में प्रवेश कर जाते हैं। मैं बिना रुके चलता रहा और लगभग 6:00 बजे बंगाईगांव पहुंच गया। बबीता कोमल जी नलबाड़ी में रहती हैं और मुझे उनसे मिलना था। उनका उपन्यास मैं हूं बबली - एक लड़की प्रकाशित हो चुका है और इस सीरीज के दो उपन्यास और आने वाले हैं। इसकी कहानी का अधिकांश हिस्सा बंगाई गांव में ही चलता है इसलिए मुझे यह जगह परिचित सी लगी। मैं काफी थक चुका था। लेकिन नलबाड़ी यहां से 120 किलोमीटर ही दूर था तो मैंने तय किया कि आज नलबाड़ी ही चलते हैं। 4-लेन की सड़क है। 120 किलोमीटर की दूरी हद से हद तीन घंटे में पूरी हो जाएगी।

लेकिन एक बार फिर यही कहूंगा कि सोचा हुआ कहां हो पाता है। चार लेन की सड़क में दो लेन बंद थी। और बची हुई दो लेनो में ट्रकों की लाइनें लगी थी। और कोढ़ में खाज का काम किया बरपेटा रोड में हो रही रास पूजा ने। नलबाड़ी पहुंचते पहुंचते रात के ग्यारह बज चुके थे। वहां भी रास पूजा हो रही थी और सारा शहर जगा हुआ था। फिर भी रात के ग्यारह बजे किसी का दरवाजा खटखटाना, वह भी ऐसे व्यक्ति का जिससे आप पहले कभी नहीं मिले हों घनघोर असभ्यता कहलाएगी। इसलिए मैंने होटल खोजना शुरू किया। एक छोटा सा जिला मुख्यालय जहां पर गिनती के होटल हों, में आधी रात के लगभग होटल खोजना भी कष्ट साध्य काम था। लेकिन पूजा के वजह से  लोग जगे हुए थे। पूछताछ करने पर  मुझे होटल प्रेमोदय का रास्ता समझा दिया गया। होटल पहुंचने पर पता चला कि पूजा के कारण होटल पूरा भरा हुआ है। इस बार मैंने गूगल देवता का आह्वान किया और उन्होंने बताया शहर से बाहर हाईवे पर एक होटल बोरदोईशिला है। मैं वहां पहुंचा लेकिन वहां पर भी यही हालत। मुझे लगा कि आज तो मुझे अपना टेंट और स्लीपिंग बैग निकालना ही पड़ेगा। लेकिन मैंने एक आखरी बार गूगल देवता की मदद ली और उन्होंने मुझे एक छोटे से होटल के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। वहां पर मुझे ₹400 में एक घटिया सा कमरा मिला। खैर, कमरा मिल गया यही बड़ी बात थी। खाना तो मैंने रास्ते में ही रुक कर खा लिया था क्योंकि मुझे अंदाजा था कि देर होने के कारण नलबाड़ी में खाना नहीं मिलेगा। चूंकि पूरा दिन भागते हुए बीता था इसलिए आज के फोटो गिनती के ही हैं।

जै जै
सुशांत के साथ

लंच